माणिकेश्वरी ही दन्तेश्वरी देवी || MA DANTESHWARI BASTAR ||
छत्तीसगढ़ राज्य के, दंतेवाड़ा जिले में, शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम पर, देवी दन्तेश्वरी माई जी का भव्य एवं प्राचीन देवालय है। इस शक्तिपीठ देवालय के साथ, इतिहास के रूप में सिर्फ एक किंवदंती ही प्राप्त होती है।यह किंवदंती, भारत में अन्य स्थलों के देवी मंदिरों के साथ भी प्रसारित है। इस किंवदंती के अनुसार —“ राजा के पीछे पीछे देवी चलती हुई आ रही थी, राजा देवी के पैरों की पायल की आवाज सुनकर आगे बढ़ रहा था। नदी में रेत की वजह से, देवी की पायल की आवाज सुनाई नहीं दी और राजा पीछे मुड़कर देखने लगा, तब देवी वहीं अंतर्ध्यान हो गई और देवी का मंदिर वहीं बना दिया गया। ”
इस प्रचलित किंवदंती को, यहां के साहित्यकारों ने वारंगल से आए, काकतीय राजवंश के शासक अन्नमदेव, से जोड़ा। देवी के वर्तमान नाम दन्तेश्वरी देवी को सीधे अन्नम देव से जोड़कर, उनकी कुल देवी कह दिया और यह माणिकेश्वरी देवी और दंतेश्वरी देवी को दो अलग अलग देवियों के रूप में प्रचारित किया। यह सब बिना संदर्भ और ऐतिहासिक साक्ष्य के दिए हुए तथ्य है, जिसका कोई आधार नहीं है।
जिससे यह किंवदंती ही, और ऐसे साक्ष्य रहित तथ्य ही, इस प्राचीन शक्तिपीठ देवालय का मूल इतिहास के रूप में स्थापित है। किंतु यह भी सत्य है कि, यह किंवदंती इस देवालय का मूल इतिहास नहीं है। सिर्फ एक किंवदंती से, देवी के इस प्राचीन शक्ति पीठ के मूल इतिहास को, अंतिम नहीं माना जा सकता है। मंदिर के इतिहास के लिए, अन्य पक्ष मंदिर के स्थापत्य, मूर्तिशिल्प, शिलालेख, धार्मिक ग्रंथ और इस क्षेत्र के राजवंशों के इतिहास का, संपूर्ण सिंहावलोकन आवश्यक है।
बस्तर को, आठवीं सदी से लेकर चौदहवीं सदी तक के शिलालेखों में, चक्रकोट कहा जाता था। इस कालखंड में, यहां पर छिंदक राजवंश के शासकों का शासन काल था। इस बस्तर क्षेत्र में, जितने भी पुरातात्विक महत्व के स्थल, मंदिर, मूर्तिशिल्प है। वह अधिकांश तौर पर, छिंदक राजाओं द्वारा एवं उससे पूर्व नल राजवंश के शासन काल में निर्मित है।
देवी दन्तेश्वरी माई जी की मुख्य प्रतिमा षष्ठ भुजा महिषमर्दिनी दुर्गा की प्रतिमा है जो कि आठवीं सदी पूर्व की निर्मित अनुमानित होती है। स्थापत्य और मूर्तिशिल्प की दृष्टि से देवी के सभी मंदिर, ग्यारहवीं सदी में निर्मित है। इनमें स्थापित प्रतिमाएं ग्यारहवीं सदी से अधिक प्राचीन है। इन मंदिरों में कुल पांच शिलालेख स्थापित है। भैरव मंदिर में एक शिलालेख और मुख्य मंदिर में चार शिलालेख स्थापित है। भैरव मंदिर के शिलालेख अनुसार, चक्रकोट राज्य के महाराज जगदेक भूषण के सामंत चन्द्रादित्य द्वारा दत्तवाड़ा के भैरव देव मंदिर को 1061 ईस्वी में बोरिग्राम दान किया गया। दूसरा अभिलेख दन्तेश्वरी मंदिर में स्थापित है, जिसमें चक्रकोट के छिंदक राजा जगदेकभूषण तृतीय नरसिंह देव द्वारा, देवी को 1224 ईस्वी में भूमि अर्पित की गई थी। इन दो शिलालेखों से अब पूरी तरह से स्पष्ट है कि, यह शक्तिपीठ ग्यारहवीं सदी में अपने इस मूल स्वरूप में स्थापित रहा है।
छिंदक राजाओं के शिलालेखों में, शासकों को माणिक्य देवी के चरणों का सेवक कहा गया है। सर्वप्रथम जगदेक भूषण प्रथम 1023 ईस्वी से 1063 ईस्वी के भैरमगढ़ शिलालेख में माणिक्य देवी का उल्लेख मिलता है। इसके बाद 1210 ईस्वी बारसूर के बत्तीसा मंदिर शिलालेख में जगदेक भूषण द्वितीय सोमेश्वर देव को, माणिक्य देवी का चरण सेवक लिखा गया है। इसके अतिरिक्त 1224 ईस्वी जगदेक भूषण तृतीय नरसिंह देव के दंतेश्वरी मंदिर शिलालेख और अन्य शिलालेखों में माणिक्य देवी का उल्लेख और देवी को भूमिदान का उल्लेख मिलता है। इसी क्रम में, कर्नाटक के होयसल राजवंश के शासकों के दो शिलालेख में चक्रकोट की माणिक्य देवी का उल्लेख मिलता है। देवी की एक प्रतिमा पर भी माणिक्य देवी का लेख है।
अब यह स्पष्ट है कि छिंदक राजवंश के शासन काल में वर्तमान दन्तेश्वरी देवी, माणिक्य देवी अथवा माणिकेश्वरी देवी के नाम से स्थापित रही और यह मंदिर उस समय से स्थापित है।
साहित्यकारों का यह दावा कि, “अन्नमराज, दन्तेश्वरी देवी को वारंगल से लेकर यहां आए और यह देवी को यहां स्थापित कर उनका मंदिर बनवाया ” यह तथ्य सिर्फ किंवदती है, वारंगल में काकतीय वंश के शासक शिव के उपासक थे। वारंगल के इतिहास में या मूर्तिशिल्प, अभिलेख आदि में वर्तमान दन्तेश्वरी देवी का कोई उल्लेख नहीं मिलता है और न ही उनका कोई मंदिर है ।
राजा के पीछे देवी चलकर आई इस किंवदंती को सच्चा इतिहास मानकर लिखने, से ऐसी साक्ष्य रहित तथ्य आया है। साहित्यकारों के साक्ष्य रहित दावों के अतिरिक्त, ऐसा कोई भी साक्ष्य नहीं है, जिससे यह ज्ञात हो कि, अन्नमराज देव की कुल देवी दन्तेश्वरी देवी थी और वे उसे वारंगल से लेकर आए।
जबकि ऐसे साक्ष्य उपलब्ध हैं कि —वारंगल से आए अन्नमदेव ने, चक्रकोट की माणिक्य देवी शक्तिपीठ के सेवक के रूप में शासन किया और माणिक्य देवी को उत्तराधिकार के रूप में कुल देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया, जो आज देवी दन्तेश्वरी माई जी के नाम से विख्यात है।
छिंदक राजवंश के पतन के बाद, इस चक्रकोट राज्य पर वारंगल के काकतीय राजवंश का शासन 1324 ईस्वी के बाद प्रारंभ हुआ। 1853 ईस्वी के बस्तर संस्कृत राजवंशावली का संकलन राजगुरु लोकनाथ ठाकुर द्वारा किया गया है। इस संस्कृत राजवंशावली में काकतीय प्रतापरुद्र 1289 ईस्वी को माणिक्य देवी का सेवक कहा गया है। चक्रकोट में काकतीय राजवंश के संस्थापक अन्नमराज देव 1324 ईस्वी को चक्रकोट की माणिक्य देवी से तलवार प्राप्ति का उल्लेख मिलता है। इसके बाद 1410 ईस्वी में महारानी मेघावती को माणिक्य देवी की सेविका कहा गया है।
इससे स्पष्ट है कि वारंगल के काकतीय राजवंश के शासकों ने चक्रकोट की माणिक्य देवी को, उत्तराधिकार के रूप में स्वीकार कर, उसके सेवक के रूप में यहां शासन किया। छिंदक राजाओं के पतन के बाद काकतीय शासन काल में भी दन्तेश्वरी माई जी, माणिक्य देवी के नाम से प्रतिष्ठित रही। इसलिए बस्तर राजवंशावली में काकतीय राजवंश के शासकों को माणिक्य देवी का सेवक कहा गया है, न कि देवी दन्तेश्वरी माई जी का।
काकतीय वंश के पतन के बाद चालुक्य राजवंश में 1709 ईस्वी में राजपाल देव के ताम्रपत्र में देवी का नाम माणिकेश्वरी देवी मिलता है। इसके बाद 1853 ईस्वी में यह वंशावली संकलित की गई, तब भी अभिलेखीय साक्ष्य में देवी का नाम, माणिक्य देवी ज्ञात होता है।काकतीय वंश के पतन के बाद, अठारहवीं सदी में, चालुक्य राजवंश में भी, दन्तेश्वरी देवी का मूल नाम माणिक्य देवी अथवा माणिकेश्वरी देवी ही प्रचलित रहा।
अठारहवीं सदी तक ऐसा कोई भी साक्ष्य नहीं है जिसमें दन्तेश्वरी देवी का नाम मिलना प्रारंभ हो अर्थात अभी तक देवी, माणिक्य देवी के नाम से जानी जाती थी।
देवी का नाम परिवर्तन, देवी सती माता के दान्त गिरने की मान्यता से प्रारंभ हुआ। बस्तर राजवंशावली 1853 ईस्वी में, अन्नमराज देव 1324 ईस्वी के समय, माणिक्य देवी को शुभ दन्त गिरने के स्थान पर स्थापित देवी कहा गया है, इससे ज्ञात होता है कि चौदहवीं सदी पूर्व से ही, यहां देवी सती के दान्त गिरने की मान्यता रही, इस स्थल पर माणिक्य देवी स्थापित है।
अठारहवीं सदी तक माणिक्य देवी, देवी सती के दान्त गिरने की मान्यता के चलते, लोक में दन्तावला कही जाने लगी थी। पहली बार देवी का यह नाम, अठारहवीं सदी अर्थात 1703 ईस्वी में दंतेवाड़ा मंदिर के दिकपाल देव के अभिलेख में, दन्तावला देवी जयति प्राप्त होता है। इसके बाद 1709 ईस्वी एवं 1853 ईस्वी तक पुनः देवी का नाम माणिक्य देवी प्राप्त होता है।
अठारहवीं सदी में पहली बार माणिक्य देवी का लोक प्रचलित नाम दन्तावला ज्ञात होता है। उन्नीसवीं सदी और बीसवीं सदी आते आते माणिक्य देवी, लोक में दन्तावला से दन्तेश्वरी देवी कही जाने लगी। इसलिए, विगत दो सौ साल के दस्तावेजों में देवी का नाम दन्तेश्वरी देवी लिखा जाने लगा और यही नाम प्रचलित और विख्यात हुआ।
इन समस्त साक्ष्यों से स्पष्ट है कि माणिकेश्वरी देवी ही, देवी सती के दान्त गिरने की पुरातन मान्यता के कारण, तीन सौ साल पहले लोक में दन्तावला और विगत दो सौ साल से दन्तावला से दन्तेश्वरी देवी कही जाने लगी। छिंदक राजवंश और उसके बाद काकतीय चालुक्य राजवंश के समय में भी उनके समस्त अभिलेखों में देवी को माणिक्य देवी अथवा माणिकेश्वरी देवी ही कहा गया। इसलिए 1853 ईस्वी तक, देवी का मूल नाम माणिक्य देवी ज्ञात होता है। साहित्यकारों के साक्ष्य रहित दावें, महज कोरी कल्पना है।
जबकि इन साक्ष्यों के अनुसार, माणिकेश्वरी देवी ही, विगत दो सौ साल से दन्तावला और दन्तेश्वरी देवी के नाम लोक में प्रचलित हुई है। काकतीय एवं चालुक्य राजवंश के शासकों ने, चक्रकोट की माणिक्य देवी को, उनके मूल नाम सहित अपनी कुल देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया और अभिलेखों में देवी का नाम माणिक्य देवी ही लिखा है। माणिक्य देवी को, डेढ़ —दो सौ साल से ,अब सिर्फ दन्तेश्वरी देवी लिखा जा रहा है।1900 ईस्वी के बाद से माणिक्य देवी का नाम सिर्फ दन्तेश्वरी देवी ही रह गया और यही लिखा जा रहा है।
डेढ़ सौ साल पहले तक देवी दन्तेश्वरी माई जी, माणिक्य देवी के नाम से जानी जाती थी, यही देवी का मूल नाम है। शक्तिपीठ के रूप में माणिक्य देवी का उल्लेख अष्टादश शक्तिपीठों में चक्रकोट की माणिक्य देवी के रूप में ज्ञात होता है। इस शक्तिपीठ की मान्यता व्यापक रही, इसलिए ओडिसा आंध्र कर्नाटक महाराष्ट्र छत्तीसगढ़ आदि स्थानों पर माणिक्य देवी अथवा माणिकेश्वरी देवी के मंदिर बने। नल, छिंदक, गंग, होयसल, पूर्वी चालुक्य, काकतीय, चालुक्य, राजवंश के राजवंशों ने माणिक्य देवी को कुल देवी के रूप में प्रतिष्ठित कर, अपने राज्यों में स्थापित किया और उनकी आराधना की।
ओम प्रकाश सोनी
असिस्टेंट प्रोफेसर इतिहास
“चक्रकोट की माणिक्य देवी —बस्तर में एक शक्तिपीठ” पुस्तक से उद्धृत एक अंश। || MA DANTESHWARI BASTAR ||
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