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"जब 40 साल के तपस्वी को एक पुजारी ने जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया।”



रामकृष्ण परमहंस और तोतापूरी के बीच का संवाद केवल गुरु-शिष्य की चर्चा नहीं थी, बल्कि यह ज्ञान और विज्ञान  का मिलन था। तोतापूरी जहाँ शुष्क वेदांत के पक्षधर थे, वहीं रामकृष्ण भाव-भक्ति के सागर थे।
इनके बीच हुए कुछ प्रमुख संवाद और तर्क-वितर्क 
1. "आग और उसकी गर्मी" 

जब तोतापूरी ने पहली बार रामकृष्ण को माँ काली की मूर्ति के सामने रोते और बात करते देखा, तो उन्होंने इसे 'भ्रम' बताया।

तोतापूरी: "तुम इस मिट्टी की प्रतिमा में क्यों उलझे हो? ब्रह्म तो निराकार है, वह निर्गुण है।"

रामकृष्ण: "महाराज, क्या आप आग को उसकी गर्मी से अलग कर सकते हैं? क्या आप दूध को उसकी सफेदी से अलग कर सकते हैं? यदि नहीं, तो आप ब्रह्म को उसकी शक्ति  से अलग कैसे कह सकते हैं? जब वह शांत है तो 'ब्रह्म' है, जब वह सृजन करती है तो 'माँ' है।"
इस तर्क ने तोतापूरी को पहली बार सोचने पर मजबूर किया कि जिस 'माया' को वे केवल एक रुकावट समझते थे, वह असल में ब्रह्म की ही सक्रिय शक्ति है।

2. "रोटी बनाने वाली माँ" 

तोतापूरी अक्सर कहते थे कि माया को त्यागना ही एकमात्र मार्ग है। रामकृष्ण ने उन्हें एक बहुत ही सुंदर उदाहरण से समझाया:

रामकृष्ण: "महाराज, एक माँ रसोई में खाना बनाती है और उसका छोटा बच्चा खिलौनों से खेलता है। जब तक बच्चा खिलौनों (माया) में खुश है, माँ रसोई का काम करती रहती है। लेकिन जैसे ही बच्चा खिलौने फेंककर जोर-जोर से 'माँ-माँ' चिल्लाने लगता है, माँ सारा काम छोड़कर उसे गोद में लेने दौड़ी चली आती है। वैसे ही, जब भक्त संसार के खिलौने छोड़कर सच्चे दिल से पुकारता है, तो माया खुद हट जाती है और ईश्वर प्रकट हो जाते हैं।"

3. अहंकार की सूक्ष्मता 

तोतापूरी को अपनी 40 साल की कठोर साधना और ब्रह्म-ज्ञान पर थोड़ा सूक्ष्म गर्व था। रामकृष्ण ने इसे बहुत ही प्रेम से तोड़ा।

संवाद: एक बार तोतापूरी अपनी धूनी (पवित्र अग्नि) के पास बैठे थे। एक नौकर वहां से आग का कोयला लेने आया। तोतापूरी उस पर चिल्ला पड़े क्योंकि उसने उनकी पवित्र जगह को छू लिया था।

रामकृष्ण (हँसते हुए): "अरे महाराज! अभी तो आप कह रहे थे कि 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (सब कुछ ब्रह्म है)। तो फिर यह नौकर और उसकी छुआछूत अलग कैसे हो गई? क्या आग में ब्रह्म नहीं है? क्या उस व्यक्ति में ब्रह्म नहीं है?"
तोतापूरी सन्न रह गए। उन्हें अहसास हुआ कि किताबी ज्ञान और व्यवहारिक ज्ञान में कितना बड़ा अंतर है। उस दिन उन्होंने माना कि रामकृष्ण भले ही 'अनपढ़' लगें, लेकिन उनका अनुभव ब्रह्मांडीय है।

4. पूर्णता की प्राप्ति 

अंत में, तोतापूरी ने स्वीकार किया कि उनकी साधना अधूरी थी। उन्होंने रामकृष्ण से कहा:

 "मैंने अब तक केवल समुद्र की गहराई देखी थी, लेकिन तुमने मुझे दिखाया कि उस समुद्र की लहरें (भक्ति) भी उतनी ही सत्य हैं जितना कि गहरा पानी।"

तोतापूरी, जो कभी 3 दिन से ज्यादा कहीं नहीं रुकते थे, रामकृष्ण के सानिध्य में 11 महीने तक दक्षिणेश्वर में रहे। यह उनके जीवन का सबसे लंबा ठहराव था।

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