नारद पुराण में 'मोहिनी एकादशी' की कथा को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। यह कथा न केवल भगवान विष्णु के मायावी रूप को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि कैसे एक पापी व्यक्ति भी अपनी श्रद्धा से मोक्ष पा सकता है।
प्राचीन काल में सरस्वती नदी के किनारे भद्रावती नाम की एक सुंदर नगरी थी। वहाँ धृतिमान नाम का राजा राज करता था। उसी नगर में धनपाल नाम का एक वैश्य रहता था, जो भगवान विष्णु का परम भक्त और बहुत ही परोपकारी था।
धनपाल के पुत्र 'धृष्टबुद्धि' का पाप
धनपाल के पाँच पुत्र थे। उनमें से सबसे छोटा पुत्र, जिसका नाम धृष्टबुद्धि था, बहुत ही दुष्ट और पापी निकला।
वह जुआ खेलता, मदिरापान करता और अपने पिता की संपत्ति को गलत कामों में उड़ाता था।
अंत में, दुखी होकर उसके पिता और भाइयों ने उसे घर से निकाल दिया।
बेघर होने के बाद, धृष्टबुद्धि जंगल में भटकने लगा और भूख-प्यास से व्याकुल होकर पशुओं का शिकार करने लगा।
भटकते हुए धृष्टबुद्धि कौण्डिन्य ऋषि के आश्रम पहुँचा। उस समय वैशाख का महीना था और ऋषि गंगा स्नान करके आ रहे थे। धृष्टबुद्धि ने ऋषि के चरणों में गिरकर प्रार्थना की, "हे ऋषिवर! मुझ पर दया करें। मैंने अपने जीवन में केवल पाप किए हैं। क्या कोई ऐसा उपाय है जिससे मुझे इन पापों से मुक्ति मिल सके?"
ऋषि ने दया भाव से कहा, "पुत्र! तुम वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की 'मोहिनी एकादशी' का व्रत करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाएंगे।"
व्रत का प्रभाव और विष्णु रूप
धृष्टबुद्धि ने ऋषि के बताए अनुसार पूरी निष्ठा से व्रत किया।
परिणाम: इस व्रत के पुण्य से उसकी बुद्धि शुद्ध हो गई। अंत में, भगवान विष्णु की कृपा से वह दिव्य देह धारण कर गरुड़ पर सवार होकर वैकुंठ धाम गया।
मोहिनी रूप का रहस्य
नारद पुराण में यह भी बताया गया है कि इस एकादशी का नाम 'मोहिनी' क्यों पड़ा। जब समुद्र मंथन के दौरान अमृत निकला, तो असुरों ने उसे छीन लिया था। तब भगवान विष्णु ने:
* विश्वमोहिनी रूप धारण किया।
* असुरों को अपनी सुंदरता और माया से मोहित कर लिया।
* सारा अमृत देवताओं को पिला दिया ताकि धर्म की रक्षा हो सके।
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