महाभारत का अद्भुत ज्ञान: भोजन की थाली से जुड़े भीष्म पितामह के 5 अनमोल नियम! 🍽️🏹
महाभारत युद्ध के अंत में जब गंगापुत्र भीष्म पितामह शरशय्या (तीरों की शैय्या) पर लेटे थे, तब उन्होंने युधिष्ठिर और अर्जुन को जीवन, राजनीति और धर्म के कई गहरे उपदेश दिए। इनमें से एक महत्वपूर्ण उपदेश 'भोजन की थाली' और उसे ग्रहण करने के नियमों पर था।
पितामह भीष्म के अनुसार भोजन कैसा होना चाहिए? आइए जानते हैं:
१. भाई-भाई का एक थाली में भोजन (अमृत समान): यदि भाई आपस में प्रेमपूर्वक एक ही थाली में भोजन करते हैं, तो वह भोजन 'अमृत' के समान हो जाता है। इससे परिवार में धन-धान्य, स्वास्थ्य और श्री (समृद्धि) की वृद्धि होती है। (जैसे पांडव मिल-जुलकर रहते थे)।
२. पति-पत्नी का एक थाली में भोजन: पितामह के अनुसार, पति-पत्नी को एक ही थाली में भोजन करने से बचना चाहिए। शास्त्रों में पति-पत्नी की एक ही थाली को 'मादक पदार्थों' (मदिरा) से भरी हुई माना गया है, जिससे परिवार में कलह या आसक्ति बढ़ सकती है।
३. पैर लगी हुई थाली: जिस भोजन की थाली को किसी का पैर लग जाए, उसका तुरंत त्याग कर देना चाहिए।
४. भोजन में बाल आना: यदि भोजन के दौरान थाली में बाल निकल आए, तो उसे वहीं छोड़ देना चाहिए। बाल निकलने के बाद भी खाया गया भोजन दरिद्रता (गरीबी) को आमंत्रित करता है।
५. लांघा हुआ भोजन: जिस भोजन की थाली को कोई व्यक्ति लांघ कर (ऊपर से पार करके) चला गया हो, वह भोजन कीचड़ के समान अशुद्ध हो जाता है, उसे ग्रहण नहीं करना चाहिए।
(नोट: पति-पत्नी के एक थाली में भोजन करने वाली बात से आज के समय में कई लोग सहमत नहीं भी हो सकते हैं। हमारा उद्देश्य केवल पौराणिक मान्यताओं और महाभारत के प्रसंग को आपके सामने प्रस्तुत करना है।)
।। जय श्री कृष्ण ।। 🦚
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