🔱 कर्ण पिशाचिनी यक्षिणी साधना 🔱
तीक्ष्ण-नेत्रा, सूक्ष्म-गामिनी, रहस्य-वाक्य-प्रकाशिनी।
कर्ण-मूल-स्थितां शक्तिं, पिशाचिनीं नमोऽस्तु ते॥
॥ मन्त्रः ॥
"ॐ ह्रीं चण्डवेगिनी वद वद स्वाहा ।"
॥ साधन-विधिः (शास्त्रीय वर्णनानुसार) ॥
1. प्रारम्भिक जप
सर्वप्रथम उक्त मंत्र का १०००० (दस हज़ार) जप एकाग्रचित्त होकर करें।
जप पूर्ण श्रद्धा एवं संयम के साथ होना चाहिए।
2. अभिमंत्रण-विधान (ग्रंथों में वर्णित)
तदुपरान्त एक अविवाहित कन्या का पूजन कर—
उसके हाथों एवं पाँवों में कुमकुम लगाएँ।
अलकों में मल्लिका (चमेली) एवं लाल कनेर के पुष्प सजाएँ।
लाल डोरे (सूत्र) से वेष्टित करें।
3. धारण-विधान
मंत्र-सिद्धि के पश्चात्—
अभिमंत्रित लाल सूत्र, मल्लिका एवं कनेर-पुष्प को धारण करने का विधान कहा गया है।
॥ सिद्धि-फलम् (तांत्रिक मान्यता) ॥
ग्रंथों के अनुसार—
‘कर्ण पिशाचिनी यक्षिणी’ साधक के वशीभूत होकर
उसे तीनों लोक तथा तीनों काल (भूत, वर्तमान, भविष्य) के शुभ-अशुभ का ज्ञान कराती है।
अर्थात् साधक को सूक्ष्म श्रवण-शक्ति एवं अंतर्ज्ञान प्राप्त होता है।
🪔 आवश्यक सावधानी एवं गूढ़ार्थ-विवेचन
1. ऐसे अनुष्ठानों में मानवीय व्यक्ति (विशेषकर कन्या) को किसी भी प्रकार से वस्तु-रूप में प्रयोग करना आधुनिक नैतिकता और धर्म दोनों की दृष्टि से अनुचित है।
2. “कर्ण पिशाचिनी” का प्रतीकात्मक अर्थ है —
अंतःश्रुति (Inner Hearing), अंतर्ज्ञान और सूक्ष्म विवेक।
3. “वद वद” का संकेत है —
मन की गहराई से उठने वाली सूक्ष्म चेतना को सुनना।
वास्तविक साधना यह है कि—
मन को शांत करें
ध्यान में सूक्ष्म ध्वनियों का अवलोकन करें
सत्य, संयम और सदाचार बनाए रखें
तभी “त्रिकाल-ज्ञान” का अर्थ बनता है —
अनुभव + विवेक + सजगता।
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