•॰ॐ॥|| #जयति_ब्रह्मास्त्रविद्या ||॥ॐ॰•
भगवान् श्रीगणेश का अत्यन्त रहस्यमय अघोर गणपति स्वरूप - प्रत्येक देवता के उपासना की दो पद्धतियाँ होती हैं -
१ • वामाचार।
२ • दक्षिणाचार।
श्रीगणेश के विविध रूपों के विषय में वेद-पुराण आदि में वर्णन प्राप्त होता है किन्तु कुछ इसे रहस्यरूप भी है जिनका उल्लेख केवल आगम/तन्त्र ग्रन्थों में ही उपलब्ध है अथवा कुछ अगम्य स्वरूपों का गुरु-परम्परा द्वारा ही ज्ञात किया जा सकता है।
भगवती श्रीचण्डिका के अतिरिक्त संसार में केवल दो ही अन्य देवता हैं जिनके स्वरूपों की संख्या सीमित नहीं है-
१• भगवान् श्रीभैरव।
२• भगवान् श्रीगणेश।
श्रीगणेश के विविध स्वरूप भी श्रीचण्डिका के समान कुछ तो अत्यन्त मनोहारी तो कुछ महा-भयावह किन्तु सभी स्वरूप विभिन्न कामनाओं की पूर्ति हेतु विशिष्ट उपासकों द्वारा उपास्य हैं।
आज हम श्रीगणेश के उन समस्त उग्रतम स्वरूपों के शिरोमणी स्वरूप श्रीअघोर गणपति के विषय में उल्लेख करने जा रहे हैं जिसका स्मरण भक्तों के समस्त विघ्नों का नाशक है- जिन्होंने उग्र होनें पर कुबेर के सम्पूर्ण ऐश्वर्य का भक्षण कर लिया तथा संसार से धन का विलोप हो गया।
अघोर गणपति के शाबर मंत्र की कुछ पंक्तियाँ —
॥ॐ नमो*****गणपत भूखे बीच मसान**** खावे ऋद्धि सिद्धि मनमान**** कण खाए मण भरे **** जो मन मांगू सो फल देत*****वाचा॥
यह अत्यंत विस्तृत मंत्र है जिसे पूर्ण प्रकाशित नहीं किया जा सकता।
प्रत्येक देवता अपनें अघोर रूप से श्मशान में अपना विशेष स्थान रखते हुए विराजमान हैं- तथा बलिमांस आदि से संतुष्ट रहते हैं।
सभी का वर्णन तो नहीं किया जा सकता किन्तु जो विशेष रूप से अघोर रूप का अवलम्बन लिए बैठे है-
१• अघोरगणपति।
२• अघोरलक्ष्मी।
३• लांगुरवीर ( अघोर हनुमान ) आदि सभी।
“श्रीअघोर गणपति” के उदरस्थ संसार की उत्पत्ति से लेकर वर्तमान तक की सम्पूर्ण ऐश्वर्य व सम्पत्तियाँ हैं- जिस प्रकार पारद स्वर्ण भक्षण करता है तथा योग्य विधिज्ञ के द्वारा वमन भी करता है उसी प्रकार श्रीविघ्नराज अघोरगणपति अपनें उपासकों के निमित्त धन धान्य ऐश्वर्य का वमन कर उसके जीवन को परिपूर्ण कर देते हैं।
शास्त्रों में अघोर गणपति के नामरूप ध्यान का उल्लेख तो प्राप्त होते हैं किन्तु स्तोत्र आदि गोपनीय होनें के कारण कम इसलिए हम श्रीभगवती कृपा से अघोरगणपति स्तोत्र का निर्माण कर प्रस्तुत कर रहे हैं-
यदि व्याकरण दृष्टि से कोई त्रुटि हो तो सुधार पूर्वक क्षमा करें।
#अथ_श्रीअघोरगणपत्याष्टकम्
महाकृष्णवर्णं दिगम्बर्यभासं
श्मशानस्थितं प्रेतशय्योपविष्टम्।
कपालोपरि स्थित्य लीलाविलासं
भजेऽहं गणेशं महाघोररूपम्॥१॥
ललाटे स्फुरच्चन्द्ररेखाविभूषं-
स्फुरन्मुण्डमाल श्चिभस्मलिप्तम्।
कृष्णाम्बरं भीमरूपं भयेशं-
नमामीं महाघोर रौद्र: विभूतिम्॥२॥
करैर्वह्निदीपं त्रिशूलं कपालं-
गदामङ्कुशं बालवीरश्च पिण्डम्।
वराभीतिदं तं महाशक्तियुक्तं-
भजेऽघोरराजं भवार्णावतारम्॥३॥
श्मशाने निशायां भयानन्दपूर्णं-
महाप्रेतसंघैः सदा सेव्यमानम्।
महाभैरव:त्वं प्रियं कालरूपं-
भजेऽहं गणेशं परं निर्विकल्पम्॥४॥
पुरो श्री:कुबेरौ स्थित:याचकद्व-
विभूत्यै पुनर्वै यतौ दीनभावौ।
यतो लभ्यते सर्वसंपत्प्रवाहः
नमामि प्रभुं तं महाघोरगण्यम्॥५॥
त्वमेवेश्वराणामपीमेकमीश:-
त्वमेवाखिलं तत्त्वमाद्यं महन्तम्।
त्वमेव प्रसन्नो हि दुःखक्षयो मे
प्रसीद प्रभोऽघोरविघ्नेश्वर त्वम्॥६॥
न ते जन्म नाशो न रूपं न नाम
न ते बन्धमोक्षौ न वेदा न यज्ञाः।
सदाऽद्वैततत्त्वं परं निर्विकारं
भजेऽहं गणेशं महाघोरमेकम्॥७॥
इदं निर्गतम् य: अनायासभावे-
महाघोररूपं स्तवं भावयुक्तम्।
लभेत् सर्वसंपत्सुखं मोक्षलक्ष्मीं
भवेन्निर्भयोऽसौ गणेशप्रसादात्॥८॥
ॐ॥||इति श्री अघोर गणपत्यष्टक स्तोत्रम् सम्पूर्णम्||॥ॐ
[ स्वरचित ]
#स्तोत्रार्थ: —
मैं उन अघोर गणेश का ध्यान करता हूँ जिनके शरीर की आभा कालमेघ के समान है, जो दिगम्बर है तथा श्मशान में प्रेत की शय्या पर विराजमान होकर कपालासन पर स्थित हो लीला करते हुए महाऽघोर रूप धारण किए हुए हैं।
जिनका ललाट उज्वल चन्द्ररेखा तथा त्रिपुण्ड्र से सुशोभित है, मुण्डमाला को आभूषण रूप में धारण करनें वाले शरीर भस्म से आलिप्त हैं,
जो कृष्ण परिधान युक्त भयंकर रूप वाले समस्त प्रकार के भय के एकमैव स्वामी उन महाघोर रौद्र स्वरूप वाले श्रीअघोर गणेश को मैं नमस्कार करता हूँ।
जिनके करकमल अग्निदीप, त्रिशूल, कपाल, गदा, अंकुश, पिण्ड तथा वरदमुद्रा युक्त भक्तों को अभय प्रदान करने वाले महाशक्ति से युक्त हैं उन अघोरराज, संसार-सागर से पार उतारने वाले गणेश को मैं भजता हूँ।
जो रात्रिकाल में श्मशान भूमि में लोकभय और आनंद से पूर्ण रहते हैं, जिनकी सेवा महान प्रेत आदि महागण करते हैं।
जो महाभैरव के अत्यंत प्रिय तथा स्वयं कालस्वरूप हैं उन निर्विकल्प परम गणेश को मैं भजता हूँ।
जिनके समक्ष साक्षाद लक्ष्मी तथा कुबेर जैसे धनपति भी निजैश्वर्य के निधन होनें पर याचक के समान दीनभाव से युक्त होकर याचना करते हैं, तथा प्रसन्न होनें पर समस्त संपत्तियाँ पुनः प्राप्त करते हैं - उन महाऽघोर परम् श्रेष्ठ श्रीगणेश को मैं नमस्कार करता हूँ।
हे सर्वसमर्थ श्रीगजानन्! आप सभी ईश्वरों के एकमात्र ईश्वर हैं, आप ही सम्पूर्ण सृष्टि के आदि मूलतत्त्व हैं।
आपके प्रसन्न होने पर ही मेरे दुःखों का नाश होता है - हे अघोर विघ्नेश्वर! आप मुझ पर कृपा करें।
आपका न जन्म है, न मृत्यु, न कोई रूप है, न नाम, आपके लिए न तो कोई बंधन है और न ही न मोक्ष, आपके स्वरूप को न वेद जानते हैं और न यज्ञ ही आपको संतुष्ट कर सकते हैं, हे प्रभो! आप तो सदा अद्वैत, निर्विकार, परम तत्त्व हैं। अत:महाघोर श्रीगणेश मैं आपको भजता हूँ।
जो मनुष्य सहज भाव से अंत:करण द्वारा प्रकट हुए, महाघोर श्रीगणेश के इस स्तोत्र का श्रद्धा और भक्ति के साथ पाठ करेगा वह समस्त प्रकार की संपत्ति, सुख को भोगकर मोक्षलक्ष्मी को प्राप्त करे ऐसी श्रीमहागणपति से प्रार्थना है।
वह गणेश जी की कृपा से निर्भय हो।
#श्रीश्री_ब्रह्मास्त्रविद्या_विजयते___🚩™️
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