प्रेत बाधा निवारण हेतु गोरखनाथ कृत विशेष प्रयोग || PRET BADHA, BHOOT PISACH ||
नाथ परंपरा में पंद्रहिया, चौबीसा, बीसा और छत्तीस जैसे यंत्रों का प्रयोग अत्यंत प्रसिद्ध माना गया है। साधना मार्ग से जुड़े अधिकांश साधक इन यंत्रों से परिचित हैं, किन्तु नाथ योगियों द्वारा सिद्ध किया गया एक और अत्यंत प्रभावशाली यंत्र है — सत्रहिया यंत्र।
यह यंत्र विशेष रूप से प्रेत बाधा, अदृश्य नकारात्मक शक्तियों तथा उग्र सूक्ष्म प्रभावों को शांत करने के लिए उपयोगी माना गया है। प्राचीन समय में जब नाथ योगी श्मशान, निर्जन स्थानों और उग्र साधना स्थलों पर साधना करते थे, तब वे इसी प्रकार के यंत्रों के माध्यम से पूरे वातावरण को अपने नियंत्रण में ले लेते थे।
इस प्रयोग के लिए साधक को चाहिए कि ताम्रपत्र पर अंकित सत्रहिया यंत्र को शनिवार की रात्रि में अपने सामने स्थापित करे।
यदि पीड़ित व्यक्ति सामने बैठ सके तो उसे सामने बैठाया जा सकता है। यदि ऐसा संभव न हो, तो उसके नाम का संकल्प लेकर यह प्रयोग उसकी अनुपस्थिति में भी किया जा सकता है। विशेष रूप से यदि आशंका हो कि प्रयोग के दौरान पीड़ित व्यक्ति उग्र हो सकता है, तो उसे सामने न बैठाना ही उचित माना गया है।
रात्रि दस बजे के बाद साधक काले वस्त्र धारण करे। पश्चिम दिशा की ओर मुख करके काले वस्त्र के ऊपर काले तिलों की एक ढेरी बनाए और उसी पर ताम्रपत्र पर अंकित सत्रहिया यंत्र स्थापित करे।
स्वयं भी काले ऊनी आसन पर बैठे।
साधना प्रारंभ करने से पूर्व भगवान भैरव का स्मरण करें। भैरव गुटिका स्थापित करें और गुड़ की ढेली का भोग अर्पित करें। फिर भैरव से रक्षा की प्रार्थना करें।
इसके बाद समस्त दिशाओं से बाधा निवारण के लिए अपने चारों ओर जल छिड़कते हुए यह मंत्र बोलें —
अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भूमि संस्थिताः।
ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया।।
फिर आकाश की ओर दृष्टि करके अंतरिक्ष में उपस्थित विघ्नों के नाश हेतु "फट्" मंत्र उच्चारित करें।
भूमि से आने वाली बाधाओं को समाप्त करने के लिए बाएँ पैर की एड़ी से पृथ्वी पर आघात करें।
इसके पश्चात लोबान की धूप प्रज्वलित करें।
अब एक सिद्ध रक्षा चक्र हाथ में लें और पीड़ित व्यक्ति के नाम से संकल्प करें —
मैं अमुक नाम, अमुक गोत्र का साधक, अमुक गुरु का शिष्य, अमुक व्यक्ति को प्रेत बाधा से मुक्त कराने के लिए अपने पूज्य गुरुदेव, पूर्वजों और पितरों की उपस्थिति में यह प्रयोग सम्पन्न कर रहा हूँ। वे अपनी सूक्ष्म शक्ति से इस कार्य में सफलता प्रदान करें।
संकल्प पूर्ण करने के बाद सिद्ध रक्षा चक्र को यंत्र के सामने स्थापित कर दें।
अब एक पात्र में जल रखें, तेल का बड़ा दीपक जलाएं और काले हकीक की माला से निम्न मंत्र की पाँच माला जप करें —
ॐ ह्रीं ह्रीं क्रीं क्रीं फट्।।
ध्यान रहे, पाँच माला पूर्ण किए बिना आसन नहीं छोड़ना है।
यदि साधना के दौरान कोई आहट सुनाई दे, भय उत्पन्न हो, वातावरण में हलचल हो या किसी प्रकार की विचित्र अनुभूति हो, तब भी मंत्र जप नहीं रोकना चाहिए।
किन्तु यदि किसी आकृति का स्पष्ट अनुभव हो जाए, तो बिना विलम्ब किए सामने रखे जल में से थोड़ा जल लेकर उस दिशा में छींटे मार दें।
ऐसा करने से प्रयोग सिद्ध माना जाता है।
मंत्र जप पूर्ण होने के बाद पात्र का शेष जल पीड़ित व्यक्ति को पिला दें।
यदि वह जल पीने में बाधा उत्पन्न करे, तो उसके शरीर पर वह जल छिड़क दें।
इस समय पीड़ित व्यक्ति अत्यधिक क्रोधित या उग्र हो सकता है, किन्तु साधक को भयभीत नहीं होना चाहिए।
इसके बाद अवसर मिलने पर पीड़ित व्यक्ति के बाएँ हाथ में सिद्ध रक्षा चक्र धारण करा दें।
अधिकांश स्थितियों में दूसरे ही दिन से उसकी उग्रता कम होने लगती है।
साधना पूर्ण होने के बाद काले हकीक की माला, सत्रहिया यंत्र और अन्य पूजन सामग्री को काले वस्त्र में बाँधकर किसी जल प्रवाह में विसर्जित कर दें।
|| PRET BADHA, BHOOT PISACH ||
Post a Comment