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भगवान वासुदेव ने वराह का ही रूप क्यों बनाया? किसी और जानवर का भी तो रूप बना सकते थे? वह क्यों नहीं?

अच्छा, आपने एक चीज नोटिस नहीं किया होगा कि जब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लिया तो उन्होंने हिरण्याक्ष को पहले मारा नहीं। 
‎बल्कि पहले गर्भोदक सागर में घुसकर सूंघते हुए भूदेवी को खोजा, जहां उसे छिपाकर रखा था और उसे फिर से कक्षा में स्थापित किया। इसके बाद उनका हिरण्याक्ष के साथ बैटल हुआ। जो कहते हैं कि बहुत साल तक चलता रहा। 
‎दरअसल भगवान का पहला उद्देश्य #हिरण्याक्ष का वध था ही नहीं, बल्कि भूदेवी की रक्षा करना था, क्योंकि उनके बंधक बनने के कारण पूरे अर्थ का मैकेनिज्म हिल गया था। कुछ नहीं हो पा रहा था। न जीवों की ग्रोथ हो रही थी और ना कोई एक्टिविटी। सारे काम रुक गए थे। सब कुछ अनकंट्रोल हो चुका था।
‎अगर यही सिचुएशन रहती और भगवान विष्णु पहले हिरण्याक्ष के साथ युद्ध में वक्त गवाते, तो हो सकता था कि धरती ही खत्म हो जाती। इसलिए भगवान की पहली प्रायोरिटी यह थी कि भूदेवी को बचा लो। फिर युद्ध होता रहेगा। 
‎ऐसा नहीं है कि जब नारायण भूदेवी को वाटरलिफ्ट करने गए तो हिरण्याक्ष ने उनका विरोध नहीं किया। वह भी उनके पीछे पीछे भागा और ललकारा - ओ शूकर के रूप में आने वाले विष्णु.. तेरे शरीर से तो भयंकर बदबू आ रही है।। रुक जा, अपनी माया से तू मुझे नहीं बरगला सकता। आजा मै तुझे अपनी गदा के नीचे पीस दूंगा। 
‎पर भगवान हरि क्रोधित नहीं हुए और शांत चित के साथ आगे बढ़ते गए। उसने बहुत प्रयास किया कि वो विष्णु जी को उकसा पाए, लेकिन ऐसा न हो पाया। पहले वराह देव ने अपना काम पूरा कर दिया, भूदेवी को उनकी कक्षा में स्थापित किया। फिर लड़ाई के लिए आगे आए।
‎अच्छा एक चीज और है, जिसके बारे में शायद ही आपके मन में सवाल उठा हो? भगवान वासुदेव ने वराह का ही रूप क्यों बनाया? किसी और जानवर का भी तो रूप बना सकते थे? वह क्यों नहीं?
‎इसका भी कारण था, क्योंकि वराह जंगली सूअर से मिलता जुलता प्राणी है। यह प्राणी अक्सर कीचड़ में रहता है और इसे अन्दर तक मिट्टी खोदने की आदत होती है। वह मिट्टी या पानी के अंदर की चीजों को अपनी थूथनी से खोदकर उसे ढूंढ सकता है। उसके सुंघने की क्षमता भी अधिक होती है।
‎यही कारण था कि वे वराह ही बने और सागर की चट्टानों के नीचे तलहटी में छुपे हिरण्याक्ष के पास भूदेवी को सूंघते हुए पहुंच गए और उन चट्टानों को खोदकर उन्हें खोज निकाला।। धरती को अपनी जगह पर रखा।
‎फिर जगन्नाथ ने हिरण्याक्ष को जवाब देते हुए कहा कि - रे हिरण्याक्ष.. क्या तू, केवल बड़ी बड़ी बातें ही करता है या फिर लड़ने का साहस भी है? उन्होंने कहा कि मैं तुम्हारे सामने हूं, तुम मुझ पर प्रहार क्यों नहीं करते? 
‎इतना कहते ही वो बिना सोच-विचार किए युद्ध के लिए आगे बढ़ गया। क्रोधित हिरण्याक्ष अपने गदा से 75,000 किमी ऊंचे और 40,000 किमी चौड़े भगवान विष्णु के उस विराट रूप पर आक्रमण करने लगा। 
‎तब भगवान ने अपने कौमोदकी गदा के पहले ही प्रहार से उसकी अंतड़ियां तक हिला दिया, वह दूर जा गिरा, लेकिन अगले ही पल वह फिर उठ खड़ा हुआ और भगवान पर दोबारा आक्रमण करने के लिए चल निकला।
‎यहां ध्यान देने वाली बात है कि आज धरती का कुल आकार 40,000 किमी है, यही वजह भी थी कि पृथ्वी को संभालने के लिए भगवान को अपना इतना बड़ा रूप लेना पड़ा।
‎अबकी बार भीषण युद्ध हुआ और बहुत समय तक भगवान उसके साथ खेल खेलते रहे। भगवान ने उसको अपनी ताकत दिखाने का भरपूर मौका दिया। साथ ही साथ पटक पटक के मारा, गिरा गिरा के मारा। घसीट घसीट के मारा। पूरा थोबड़ा बिगाड़ दिया।
‎पर इधर इतनी देर तक चल रहे युद्ध को देखकर इंद्र आदि देवों की सांसे ऊपर नीचे होने लगीं। वे बैचेन होने लगे। उन्होंने ब्रह्मा जी और नारद जी के माध्यम से आवाहन कराया - हे नाथ, इस असुर को मारना तो आपके लिए चींटी को मारने जैसा है, फिर इसको इतना भाव क्यों देना? जल्दी से इस असुर को मारकर इसके अत्याचार से ब्रह्माण्ड को मुक्ति दो।
‎फिर भगवान ने अपनी ओर आक्रमण करने आ रहे हिरण्याक्ष पर एक मुष्टि का प्रहार किया और वह दूर जा गिरा। फिर देखते ही देखते वराह देव ने उसके सीने पर अपने दोनों पैरों से उछलकर एक और प्रलयनकारी धक्का दिया, इसके बाद वह कराहती हुई ब्रह्माण्ड को कंपा देने वाली आवाज के साथ दूर सागर में छपाक जाकर गिरा, जहां सुनामी जैसी सिचुएशन बन गई।
‎फिर नारायण ने अपने सुदर्शन चक्र का आवाहन किया और एक ही प्रहार से उसके शरीर के कई टुकड़े कर डाले। इस तरह हिरण्याक्ष का वध हो गया और उसकी प्राण ज्योति परमपिता परमेश्वर विष्णु जी में आकर पुनः समाहित हो गई। वह भगवान के स्पर्श मात्र से अपने पाप से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्त हो गया।
‎तीनों लोक बधाई हो, अभिनंदन हो, वराह देव की जय हो, भगवान श्री हरि विष्णु की जय हो, के जय घोष के साथ गूंज उठा। 

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः..।।।।।।
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