मेवाराम कपड़े का एक बहुत बड़ा व्यापारी था घर में किसी चीज की कमी नहीं थी। एक लड़का, एक लड़की, सुन्दर पत्नी पूरा संस्कारी परिवार था। घर में एक बहुत ही सुन्दर और विशाल मन्दिर जिसमें ठाकुर जी और किशोरी जी की भव्य मूर्ति जिसका उसकी पत्नी नित्य बहुत सुन्दर श्रृंगार करती थी। नित्य नए-नए वस्त्र धारण करवाती थी, तरह-तरह के व्यंजनों से ठाकुर जी और किशोरी जी को भोग लगाती थी। मेवाराम अपनी पत्नी को इस लग्न से ठाकुर जी की सेवा करते देखकर बहुत आनन्दित होता था और मन में सोचता था कि मैं कितना सौभाग्यशाली हूँ जो मुझे इतनी संस्कारी पत्नी मिली है और इतनी अच्छे संस्कार उसने अपने बच्चों को दिए हैं। वह मन ही मन सोचता मेरा घर किसी मन्दिर से कम नहीं है वह बस इसी बात से अन्दर खुश होता रहता था मैं तो धरती पर ही स्वर्ग देख रहा हूँ।
उस स्वर्ग से सुन्दर घर को उस समय नजर लग गई जब अचानक से किसी बीमारी के कारण उसकी पत्नी ठाकुर धाम को प्यारी हो गई। पत्नी की एकदम से चले जाने के बाद मेवाराम तो एकदम से टूट गया अब तो उसका किसी चीज में मन नहीं लगता था इतना बड़ा व्यापारी काम ठीक ढंग से ना करने के कारण उसका काम ठप्प हो गया। इतनी बड़े दुकान से अब वह बिल्कुल छोटी सी दुकान पर आ गया। जिससे घर का गुजारा बड़ी मुश्किल से होता था। घर में हर चीज की कमी आ गई थी। खाने-पीने में, बच्चों की पढ़ाई में। लेकिन मेवाराम ने ठाकुर जी की सेवा में कोई कमी ना आने दी क्योंकि ठाकुर जी की सेवा करके उसको ऐसा लगता था जैसे वह अपनी पत्नी के अधूरी सेवा को पूरा कर रहा है अब तो वह ठाकुर जी को भोग लगाकर उनकी सेवा करके ही मन को तसल्ली दे देता था। छोटी सी दुकान का पर कमाई बड़ी मुश्किल से होती थी। क्योंकि छोटी सी दुकान पर भी मेवाराम ठीक तरह से मन लगाकर नहीं जा पाता था। अब तो धीरे-धीरे बच्चों को भी समझ आ गई कि मेवाराम हमारी पढ़ाई का खर्चा नहीं उठा पाएगा इसलिए बच्चे संस्कारी होने के कारण अपने पिता को तंग नहीं करना चाहते थे उन्हें खुद ही मेहनत करके खुद ही पढ़ना शुरू कर दिया। बच्चे पहले नौकरी पर जाते बाद में पढ़ते। घर पर सारा दिन केवल मेवाराम अकेला रहता था। मेवाराम ठाकुर जी के लिए अपने दुकान से लाए हुए कपड़े से उनके लिए एक पोशाक बनाना चाहता था लेकिन अब उसमें वह शक्ति नहीं रही थी और ना ही उसकी आँखें इतना काम करती थी लेकिन फिर भी वह रोज धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा करके ठाकुरजी और किशोरी जी के लिए पोशाक बनाने का काम करता।
6 महीने बीत गए उसकी पोशाक बनकर तैयार नहीं हुई थी। वह अपने आप को बहुत कोसता था कि मेरी पत्नी तो हर रोज ठाकुर जी को नए नए वस्त्र धारण करवाती थी लेकिन मैं बदकिस्मत ऐसा नहीं कर पा रहा हूँ कई बार तो वस्त्र सिलते सिलते उसके हाथों में सुई चुभ जाती लेकिन उसको इस दर्द में भी आनन्द चाहता आता था।
रात को सोने से पहले वह ठाकुर जी की पूरी सेज सजाता ठाकुर जी और किशोरी जी के लिए पीने के लिए साफ जल रखता खाने के लिए कभी खीर और कभी हलवा कचोरी रखता। क्योंकि उसकी पत्नी हमेशा ऐसा करती थी और उसकी पत्नी का कहना था कि रात को ठाकुर जी किशोरी जी यहाँ आकर विश्राम करते हैं और अगर कभी उनको भूख लगी तो वह कुछ खा सकते हैं अगर प्यास लगी तो पानी पी सकते हैं। बस अपनी पत्नी की निष्ठा और विश्वास का वह पालन कर रहा था। उधर किशोरी जी और ठाकुर जी ने एक दिन जब उन्होंने निकुंज में प्रवेश किया तो सभी सखियों ने मिलकर बहुत ही सुन्दर तरीके से घी से बने हुए दीपों की कतार लगाई हुई थी जो कि बहुत ही सुन्दर प्रतीत हो रही थी।
ठाकुर जी और किशोरी जी ने जब निकुंज में प्रवेश किया तो वह अब धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे थे थोड़ी ही दूर जाने पर उन्होंने देखा कि उनके विश्राम के लिए बहुत ही सुन्दर सेज सखियों ने सजाई हुई है पास ही किशोरी जी के श्रृंगार का पूरा सामान रखा हुआ है जैसे कि बहुत सुन्दर फूलों की माला रखी हुई है,हाथों पर लगाने के लिए मेहंदी रखी हुई है, पांव में लगाने के लिए आलता रखा हुआ है, मस्तक के लिए चंद्रिका रखी हुई है और सब सखियाँ बड़ी बेसब्री से किशोरी जी को श्रृंगार करने के लिए लालायित है, खाने के लिए बहुत स्वादिष्ट व्यंजन रखे हुए हैं पान का बीड़ा जो किशोरी जी को बहुत पसन्द है रखा हुआ है और सेज को बहुत ही सुन्दर एक वृक्ष के नीचे सजाया हुआ है।
किशोरी जी ठाकुर जी जैसे ही विश्राम करने के लिए बैठे तभी सभी सखियों उनके पास आ गई कि शायद ठाकुर जी किशोरी जी को उनकी सहायता चाहिए होगी लेकिन ठाकुर जी ने आँखों ही आँखों में सभी सखियों को बड़ी विनम्रता से आग्रह किया कि आज किशोरी जी का श्रृंगार और उनकी सेवा का सौभाग्य उनको प्राप्त करने दो तो सभी सखियाँ लाल जू का इशारा समझते हुए वहाँ से चली गई।
ठाकुर जी ने किशोरी जी के पांव में बड़े ही प्यार से आलता लगाया और बड़े प्यार से उनकी वेणी को गुंथा, उस पर गजरा लगाया माथे पर सुनहरी रंग की बिंदिया को लगाया सिर पर चुन्नी को ओढ़ा कर उस पर बहुत ही सुन्दर चंद्रिका को धारण करवाया। अभी वह इतना श्रृंगार कर ही रहे थे तभी एकदम से ठंडी और शीतल हवा चलने लगी तभी एक सुन्दर हवा का झोंका किशोरी जी और ठाकुर जी के चरणों को जैसे प्रणाम करता हुआ वहाँ से निकल गया। अचानक आसमान में बादल गरजने लगे जोर-जोर से बिजली चमकने लगी और अचानक से मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। बारिश की वह बूँदेंं ना जाने कब से इस इंतजार में थी कि कब उनको सौभाग्य प्राप्त हो वह किशोरी जी और ठाकुर जी के अंग को स्पर्श कर सके।
तभी वर्षा का पानी वृक्ष के नीचे बैठे लाल जू और किशोरी जू के ऊपर पड़ने लगा लगातार बारिश को होते देखकर किशोरी जी का मन उस बरखा में भीगने के लिए मचलने लगा और वह झट से वहाँ से उठकर बारिश में आनन्द लेने लगी वास्तव में वह बारिश का आनन्द नहीं बल्कि बारिश की बूंदों को सौभाग्य दे रही थी जिनकी चाहत थी कि वह किशोरी का अंगीकार करें उनके चरणों को स्पर्श करें लेकिन ऊपर से आने के कारण बारिश की बूँदें ऐसे लग रहा था कि जैसे लाडली जी के सुकोमल अंगों पर उनका प्रहार हो रहा हो जिनको लाडली जू के सुकोमल अंग शायद सहन न कर पा रहे थे।
लाल जू यह सब देख रहे थे और उन्होंने जाकर लाडली जी से कहा कि यहाँ वृक्ष की ओट में आ जाओ यह बारिश की बूँदें तुम्हारे कोमल शरीर पर बहुत तेजी से प्रहार कर रही हैं लेकिन लाडली जू मुस्कुरा कर बोली नहीं कान्हा मुझे तो आनन्द आ रहा है लेकिन शीतल हवा और बारिश के कारण अब किशोरी जू काँपना शुरू हो गई कान्हा को अब चिन्ता होने लगी उन्होंने देखा कि उनकी प्रिया ठण्ड के कारण काँप रही है तो उन्होंने उसको अपने सीने से लगाकर कुछ गर्माहट देने की कोशिश की लेकिन वह भी असफल रहे क्योंकि लाल जू तो खुद ही वर्षा के कारण भीग गए थे अब तो ठाकुर जी को भी चिन्ता होने लगी कि मेरी प्रिया को कष्ट सहना पड़ रहा है बारिश के कारण अब तो निकुंज की धरती भी बिल्कुल गीली हो गई थी ठाकुर जी चाहते थे कि वह जल्दी से जल्दी महल पहुँच जाएं लेकिन वहाँ जाने के लिए भी उनको काफी समय लग सकता था उन्होंने किशोरी को अपने अंक में उठा लिया और जल्दी से जल्दी वहाँ से चल पड़े अभी कुछ दूरी पर ही पहुँचे थे तभी उनको मेवाराम का घर दिखाई दिया जहाँ पर अभी भी रोशनी थी और अन्दर से एक अजीब तरह की सुगंध आ रही थी जिसमें ठाकुर जी उस और खींचे चले गए अंततः जब वहाँ पहुँचे तो घर का दरवाजा खुला हुआ था ठाकुर जी ने सोचा कि किशोरी जी को यहाँ कुछ देर के लिए विश्राम कराया जाए और वह गोद में उठाए हुए किशोरी जी को अन्दर ले गए वह यह देख कर हैरान हो गए के अन्दर घर के कमरे में बहुत ही सुन्दर सेज सजी हुई है जिस पर बहुत ही सुन्दर दो पोशाकें पड़ी हुई है, हाथों से बनाई हुई फूलों की माला पड़ी हुई है पान का बीड़ा पड़ा हुआ है केसर की खीर बनी पड़ी हुई है जल का एक लोटा पड़ा हुआ है लेकिन जब उन्होंने इधर-उधर देखा बाकी सारे घर में अंधेरा था उनको कोई नजर ना आया तो ठाकुर जी ने जल्दी-जल्दी किशोरी को वहाँ पडी पोशाक को धारण करने के लिए कहा और खुद भी वहाँ पड़े हुए वस्त्रों को पहन लिया।
काफी देर वर्षा में भीगने के कारण अब तो ठाकुर जी और किशोरी जी को तीव्र भूख लगी हुई थी भूख को शांत करने के लिए ठाकुरजी और किशोरीजी ने वहाँ पड़ी केसर वाली खीर को ग्रहण किया जो कि अत्यंत स्वादिष्ट थी।
मेवाराम के द्वारा बनाए वस्त्रों में ठाकुर जी और किशोरी जी अत्यंत सुन्दर लग रहे थे ठाकुर जी तो एकदम से हैरान हो रहे थे कि यहाँ पर हमारे ही नाप के वस्त्र कैसे पढ़े हुए थे किशोरी जी तो उन वस्त्र में अत्यंत रूपवान लग रही थी ठाकुर जी तो उसके इस रूप को देखकर ठगे से रह गए थे कि आज से पहले किशोरी जी को मैंने कभी भी इतना सुन्दर स्वरूप नहीं देखा जितना कि वह इन वस्त्रों को धारण करके सुन्दर लग रही है। पास रखें पान के बीड़े में से दोनों ने एक एक पान खाया पान का बीड़ा खाने के कारण दोनों के होंठ बिल्कुल लाल हो चुके थे।
जब सुबह हुई तो मेवाराम उस कमरे में गया तो उसने देखा कि आज ही अचानक इस कमरे में इतनी सुन्दर इत्र की खुशबू कहाँ से आ रही है वह वहाँ गया तो वहाँ का दृश्य देखकर हैरान हो गया मिट्टी से सने हुए किसी के पांव के निशान कमरे में थे ठाकुर जी के और किशोरी जी के लिए बिछाए पलंग के ऊपर पड़े हुए वस्त्र वहाँ पर नहीं थे। वहाँ पर तो हीरे रत्न जड़े किसी की पोशाकें पड़ी हुई थी जोकि ठाकुर जी और किशोरी जी वहाँ पर अपने वस्त्र छोड़ गए थे।पान का बीड़ा खाया हुआ था खीर का लोटा खाली था जल पिया हुआ था मेवाराम यह सब देखकर स्तब्ध रह गया कि वह कोई स्वपन तो नहीं देख रहा क्या वास्तव में ठाकुर किशोरी जी यहाँ आए थे मेरे द्वारा आज ही तैयार हुई पोशाकों क्या वह धारण करके गए हैं मेरे द्वारा बनाई गई खीर को क्या वह ग्रहण करके गए हैं।
उसने जो अपने हाथों से फूलों की माला को बनाया था उन्होंने धारण कर के गए हैं यह सोच सोच कर उसकी आँखों में अश्रु धारा निरन्तर बहने लगी क्या सच में आज मुझ पर लाल जू और किशोरी जू को दया आ गई लेकिन वह हैरान था कि उस कमरे में तो मिट्टी से सने हुए आने के तो एक ही चरण के निशान है लेकिन वापसी में 2 चरणों की छाप थी वह उन चरणों में मस्तक रख कर लौटने लगा और चरणों पर मस्तक रखते ही उसको ऐसे लगा कि जैसे किशोरी जी और ठाकुर जी ने उसके सर पर हाथ रख कर उसको आशीर्वाद दिया है है वास्तव में वर्षा में भीगने के कारण ठाकुर जी ने किशोरी को अपने अंक में उठाया हुआ था इसलिए आते वक्त ठाकुर जी के ही अकेले चरणों के चिन्ह थे और जाते समय ठाकुर विशाल जी के दोनों के चरणों की छाप मेवाराम के मन्दिर के फर्श पर थी। वह उन चरणों में मस्तक रख कर जोर जोर से रोने लगा और बलिहार जाने लगा कि क्या मैं इतना भाग्यशाली हो गया हूँ जो कि ठाकुरजी और किशोरीजी को मुझ पर इतनी दया आ गई।
वास्तव में यह सब लीला ठाकुर की थी क्योंकि इतने महीनों से इतने विश्वास निष्ठा और लगन से मेवाराम पोशाक को बना रहा था आज ही वह बनकर तैयार हुई थी और उसी का मान रखने के लिए यह सब लीला ठाकुर जी ने की थी नहीं तो जिस ठाकुरजी और किशोरीजी के अन्दर हजारों सूरज की तपिश विद्यमान हो उनको सर्दी गर्मी का एहसास कैसे हो सकता है लेकिन एक भक्त की भक्ति निष्ठा और विश्वास का मान रखने के लिए उन्होंने सभी लीला की थी इसलिए अगर हम भी सच्ची निष्ठा लगन और प्रेम से ठाकुर जी और किशोरी जी के लिए कुछ बनाते हैं उस प्रेम का मान करने के लिए ठाकुर जी और किशोरी जी अवश्य उसको ग्रहण करते हैं। आज मेवाराम को उसकी सेवा का मेवा मिल चुका हुआ था।
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