Top News

क्यों वैशाख मास अत्यंत पवित्र है।प्यासे को जल देना सबसे बड़ा पुण्य है।

प्राचीन भारत के एक विशाल नगर में हेमकुंडल नाम का एक प्रसिद्ध ब्राह्मण रहता था। जन्म से वह सुवर्ण समान तेजस्वी था—वेद वेदांगों का गहरा ज्ञाता, अनुष्ठानों का पारंगत, और दान-पुण्य की महिमा को जानने वाला। परंतु उसके स्वभाव में एक बड़ी दुर्बलता थी—लोभ और क्रोध।
यज्ञानुष्ठान करता अवश्य था, परंतु उसके मन का केंद्र ईश्वर नहीं, बल्कि धन-संग्रह था। वह यजमानों से अधिक दक्षिणा लेने के लिए छल-कपट भी कर लेता था।
उसके हृदय में करुणा का नाम मात्र भी न था। भीख माँगने आए गरीबों को वह डपटकर भगा देता था, और जरा-सी बात पर क्रोध कर उठता था।
कहते हैं—
“ज्ञान अनल है, पर करुणा शीतल जल है।
दोनों साथ हों तभी जीवन सुंदर बनता है।”
हेमकुंडल का ज्ञान आग की तरह दहकता था, पर करुणा का जल उसमें न था।
समय बीता, और एक दिन उसकी मृत्यु का समय आ पहुँचा।

जब यमदूत उसे ले गए और उसके कर्मों का लेखा-जोखा खोला गया, तो पाया गया कि—
उसने वेदज्ञान का उपयोग मात्र अपने स्वार्थ के लिए किया,
अत्यधिक लोभ में रहा,
और क्रोध के कारण अनेक लोगों को दुख पहुँचाया।
इसलिए, उसके सत्कर्म बहुत हल्के पड़े और तामसी प्रवृत्तियाँ भारी।
यमराज ने निर्णय दिया—
“स्वार्थी विचार और अहंकार के कारण यह ब्राह्मण अगले जन्म में 'व्याध' अर्थात् शिकारी होगा।”
और इस प्रकार हेमकुंडल का पुनर्जन्म जंगल के एक निर्धन परिवार में व्याध रूप में हुआ।

अब वह घने जंगलों में घूम-घूमकर जीवों को मारकर जीवन यापन करता था।
उसका हृदय कठोर था, क्रोध उसका स्वभाव था, और हिंसा उसका कर्म।
लेकिन कर्मों का संस्कार कभी पूर्ण रूप से मिटता नहीं।
बीते जन्म का थोड़ा ज्ञान और आध्यात्मिक संस्कार उसकी आत्मा में कहीं गहराई में छिपा हुआ था।

वैशाख मास का समय था—
सूरज आग की वर्षा करता हुआ आकाश में खड़ा था।
धरती धधक रही थी, पक्षी प्यास से व्याकुल थे, और हवा मानो अंगारों से भरी थी।
उसी तपन के मध्य, एक दिन शंख मुनि नामक एक महान तपस्वी उस वनमार्ग से होकर गुजर रहे थे।
वर्षों की तपस्या से उनका शरीर क्षीण था।
गर्मी असहनीय थी, और जल न मिलने के कारण वे प्यास से व्याकुल हो उठे।
चलते-चलते अचानक उनकी दृष्टि धुंधली होने लगी, पाँव लड़खड़ा गए, और वे मूर्छित होकर गिरने ही वाले थे।
उसी क्षण व्याध, जो पास ही कहीं छुपकर किसी पशु को लक्ष्य कर रहा था, मुनि को गिरते हुए देख भागकर उनके पास पहुँचा।
यह आश्चर्य की बात थी—
जिस हृदय में हिंसा ही थी, उसी में अचानक दया की लहर उठ गई।
यह वैशाख मास का प्रभाव था, जब कहा जाता है कि भगवान माधव स्वयं लोकों के पाप हरने हेतु पृथ्वी पर अत्यंत सहजता से उपलब्ध होते हैं।
व्याध ने तुरंत—
मुनि को उठाकर एक विशाल वृक्ष की छाया में लेटाया,
अपने थैले से शीतल जल निकालकर उनके अधरों से लगाया,
और पलाश के पत्तों से धीरे-धीरे हवा करने लगा।
कुछ ही क्षणों में मुनि की चेतना वापस लौटी।
उन्होंने अपने सम्मुख खड़े व्याध को देखा, जिसकी आँखों में कोमलता थी।

मुनि ने कहा—
“वत्स! आज वैशाख के पवित्र मास में तुमने एक प्यासे को जल दिया,
उसे छाया दी,
और प्राणरक्षा की।
जान लो—
यह पुण्य हजारों वर्षों की तपस्या से भी दुर्लभ है।"
फिर वे बोले—
“वैशाख में भगवान विष्णु 'माधव' रूप से जल में निवास करते हैं।
जो इस मास में प्यासे को जल देता है, वह स्वयं माधव को जल अर्पित करता है।
यही क्षण तुम्हारे जीवन का मोड़ है, वत्स!”
मुनि की मधुर वाणी, उनका तेज, और सत्य की शक्ति ने व्याध के हृदय को चीर दिया।
वह भाव-विभोर हुआ और उसके भीतर वर्षों से जमी कठोरता पिघलने लगी।
वह बोला—
“भगवन्, मेरे जीवन में तो हिंसा ही है।
क्या मैं भी सुधार सकता हूँ?”
मुनि मुस्कुराए—
“मनुष्य अपने एक संकल्प से ही बदल जाता है।
हिंसा का त्याग करो,
दया का मार्ग अपनाओ,
और भगवान माधव का स्मरण करते हुए प्राणियों की रक्षा करो।”
उस दिन के बाद व्याध ने अपने जीवन का मार्ग बदल दिया—
उसने हिंसा त्याग दी,
कमजोरों की सहायता करने लगा,
सुप्त संस्कार जागे और वह भक्ति में लीन होने लगा,
कई बार वह भूखा रहकर भी किसी प्यासे या थके हुए को जल और फल दे देता।
उसका हृदय स्वच्छ होता गया,
उसका मन शांत होता गया,
और अंततः एक दिन गहन साधना में ही उसके प्राण शांतिपूर्वक निकल गए।
जब उसकी आत्मा यमपुरी पहुँची,
उसके कर्मों का लेखा अब उज्ज्वल था।
उस दिन यमराज स्वयं खड़े हुए और बोले—
“व्याध रूप में भी जिसने दया और भक्ति का मार्ग चुना,
वह मोक्ष का अधिकारी है।"
और इस प्रकार हेमकुंडल व्याध ने जन्मों के अंधकार को हटाकर मोक्ष प्राप्त किया।

वैशाख मास अत्यंत पवित्र है।
प्यासे को जल देना सबसे बड़ा पुण्य है।
वास्तविक परिवर्तन ज्ञान से नहीं, करुणा से होता है।
कोई भी मनुष्य कितना भी गिरा हुआ क्यों न हो,
एक शुभ कर्म—उसकी पूरी दिशा बदल सकता है।

Post a Comment

Previous Post Next Post