दक्षिण भारत के वारसी नामक प्रांत में महान भक्त जोग परमानन्द जी का जन्म हुआ था। बचपन से ही उनका मन खेल-कूद के बजाय भगवान की कथा और कीर्तन में अधिक रमता था। वे कीर्तन में इतने मग्न हो जाते थे कि भूख-प्यास की सुध भी नहीं रहती थी।
एक बार कथा सुनते समय जब वक्ता भगवान के अनुपम स्वरूप का वर्णन कर रहे थे, परमानन्द जी उसी रूप में खो गए। जब आँखें खुलीं, तो उन्होंने देखा कि साक्षात पीताम्बर धारी वनमाली उनके सामने खड़े हैं। परमानन्द जी के आंसुओं ने प्रभु के चरणों को पखार दिया और प्रभु ने अपनी कृपा दृष्टि से उन्हें धन्य कर दिया। दुनिया ने उन्हें "पागल" कहा, पर जिसे प्रभु के नाम का अमृत मिल जाए, उसे संसार का कीचड़ भला कैसे भाता?
परमानन्द जी पंढरपुर आ गए और वहाँ एक अनूठा नियम बनाया। वे प्रतिदिन भगवान की पूजा के बाद मंदिर के सामने गीता जी का एक श्लोक पढ़ते और एक साष्टाङ्ग दण्डवत (पूरा लेटकर प्रणाम) करते। इस प्रकार वे:
* प्रतिदिन 700 श्लोक पढ़ते।
* प्रतिदिन 700 दण्डवत करते।
* यह नियम पूरा होने के बाद ही वे भिक्षा माँगने जाते और प्रसाद पाते।
चाहे जेठ की तपती दुपहरी हो या पौष की जमा देने वाली ठंड, वर्षा हो या कीचड़, उनका यह नियम कभी नहीं टूटा।
एक बार एक साहूकार ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें एक महँगा रेशमी थान (कपड़ा) भेंट किया। पहले तो उन्होंने मना किया, पर साहूकार के अत्यधिक आग्रह पर उसे स्वीकार कर लिया।
अगले दिन वे वही रेशमी वस्त्र पहनकर मंदिर आए। उस दिन वर्षा हो रही थी और चारों ओर कीचड़ था। दण्डवत करते समय उनका मन भगवान के बजाय उस कीमती कपड़े में अटक गया। वे बार-बार कपड़ा संभालते ताकि वह कीचड़ से खराब न हो जाए। उनके दण्डवत में वह भाव नहीं रहा।
तभी उन्हें एक आवाज सुनाई दी:
"परमानन्द! आज तू वस्त्र को देख रहा है, मुझे नहीं देखता?"
यह सुनते ही परमानन्द जी का हृदय ग्लानि से भर गया। उन्होंने तुरंत उस वस्त्र को फाड़कर फेंक दिया और स्वयं को अपराधी मानकर नगर के बाहर चले गए।
प्रायश्चित और साक्षात दर्शन
अपने अपराध का प्रायश्चित करने के लिए उन्होंने स्वयं को दो बैलों के जुए से बांध लिया और बैलों को भगा दिया। उनका शरीर काँटों और कंकड़ों से छिल गया, खून बहने लगा, लेकिन वे प्रसन्न होकर "राम! कृष्ण! गोविन्द!" पुकारते रहे।
भक्तवत्सल भगवान से अपने भक्त का यह कष्ट देखा नहीं गया। वे एक ग्वाले के रूप में प्रकट हुए, बैलों को रोका और परमानन्द जी को मुक्त किया। प्रभु ने उनसे कहा:
"तुमने अपने शरीर को इतना कष्ट क्यों दिया? तुम्हारा शरीर तो मेरा हो चुका है। तुम्हारा खाना मेरा भोग है, तुम्हारा चलना मेरी परिक्रमा है और तुम्हारी बातें मेरी स्तुति हैं। तुमने खुद को कष्ट देकर मुझे रुला दिया है।"
प्रभु ने उन्हें गले से लगा लिया और उनके सारे घाव तुरंत भर गए। इस अद्भुत लीला के कारण उनका नाम "दण्डवती जोग परमानन्द" पड़ गया।
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