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ज्ञान-विज्ञान, गणित, खगोल, रस रसायन शास्त्र के गूढ़ रहस्य और शास्त्रों की कहानी

यज्ञ वेदी से दशमलव तक: भारतीय गणित और विज्ञान की अद्भुत विरासत

शाम हो चुकी थी, पश्चिम में लालिमा फ़ैलना शुरू हो चुकी थी, पक्षी अपने घोंसलों की और लौटा रहे थे। गार्गी और अनुषा दोनों मेरे पास आँगन में बैठे थे , उनकी आँखों में जिज्ञासा चमक रही थी।

“पापा ,” गार्गी ने पूछा, “क्या प्राचीन भारत में सच में विज्ञान इतना विकसित था? या यह सिर्फ कथाएँ हैं?”

पिता मुस्कुराए, “यह केवल कथाएँ नहीं, बल्कि एक जीवित परंपरा है। आज मैं तुम लोगों एक ऐसी यात्रा पर ले चलूँगा जहाँ यज्ञ वेदी, तारे, गणित, चिकित्सा सब एक साथ जुड़ते हैं।”

मैंने कहा, “कल्पना करो, गंगा नदी के किनारे एक आश्रम है। वहाँ एक आचार्य अपने शिष्यों के साथ यज्ञ वेदी बना रहे हैं।”

पुत्री ने पूछा, “क्या वे सिर्फ पूजा के लिए बना रहे थे?”

“हां भी और नहीं भी,” मैंने कहा “ वह पूजा के लिए अवश्य था लेकिन उस वेदी के निर्माण में एक वैज्ञानिक प्रक्रिया छुपी थी।”

“कैसे?”

“वे रस्सी (शुल्ब) से मापते थे, गांठों से दूरी तय करते थे, और 3-4-5 के त्रिभुज से समकोण बनाते थे। यह वही सिद्धांत है जिसे बाद में पाइथागोरस प्रमेय कहा गया। और हमने इसके पहले भी देखा है, ये मिस्र और मेसोपोटामिया के लोग भी जानते थे।”

अनुषा उत्साहित हो गई, “तो गणित वहीं से शुरू हुआ?”

मैंने आगे कहा “गणित जीवन से जुड़ा था। शुल्बसूत्र में इन सभी विधियों का विवरण मिलता है।”

“और वेदी के आकार?”

“वर्ग, वृत्त, बाज के आकार की शेनचिति हर आकार का अर्थ था। उस समय यह केवल संरचना नहीं, बल्कि ब्रह्मांड का प्रतीक था।”

शाम हो गई थी। आकाश तारों से भर गया।

अनुषा ने पूछा, “ताऊजी, क्या प्राचीन लोग सच में जानते थे कि पृथ्वी घूमती है?”

मैंने उत्तर दिया ,“हाँ, और यह आर्यभट्ट ने बताया था।”

“उन्होंने क्या कहा था?”

“उन्होंने कहा कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, और दिन-रात उसी से होते हैं। उन्होंने ग्रहणों का कारण भी वैज्ञानिक रूप से समझाया।”

“और कौन थे ऐसे विद्वान?”

मैंने गाथा आगे बढ़ाई,“वराहमिहिर ने ग्रहों, नक्षत्रों और मौसम का गहन अध्ययन किया।”

“क्या वे भविष्य बता सकते थे?”

मै मुस्कराया “ प्राचीन भारत में ज्योतिष का अर्थ था ज्योति पिंडो की गति का अध्ययन , वे गणना के आधार पर ग्रहो की स्तिथि, सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण का समय बता देते थे। ब्रह्मगुप्त ने ग्रहों की स्थिति और ग्रहण का समय निकालने के सूत्र दिए। लेकिन इन सब गणनाओ के आधार पर मानव का भविष्य बताना बाद में ज्योतिष में आया। ”

“और आगे?”

“भास्कराचार्य ने इन सबको और आगे बढ़ाया और गुरुत्वाकर्षण जैसी शक्ति का भी उल्लेख किया। यह गुरुत्वाकर्षण जैसी किसी शक्ति के आस्तित्व के ज्ञान का आरंभिक रूप था, जिसे आधुनिक युग में न्यूटन और आइंस्टाइन ने गणितीय आधार और सार्वभौमिकता दी।”

गार्गी ने पूछा, “क्या ये सब केवल खगोलशास्त्री थे?”

“नहीं, ये महान गणितज्ञ भी थे।”

“जैसे?”

“ब्रह्मगुप्त ने शून्य और ऋणात्मक संख्याओं के नियम दिए। भास्कराचार्य ने बीजगणित और कलन जैसी अवधारणाओं को आगे बढ़ाया।”

अनुषा “तो गणित और खगोल साथ-साथ थे?”

मैंने उत्तर दिया “हाँ, “क्योंकि आकाश को समझने के लिए गणना जरूरी थी।”

बच्चे उत्सुक हो गए ,“तो क्या उस समय चिकित्सा भी विकसित थी?”

“बहुत अधिक। हमारे यहाँ महान वैद्य हुए। जैसे चरक, सुश्रत ”

“चरक ऋषि ने शरीर, रोग और औषधियों का गहन अध्ययन किया। उनकी कृति चरक संहिता चिकित्सा का आधार है। सुश्रुत को शल्य चिकित्सा का जनक कहा जाता है।”

बच्चे चकित रह ये गए, “क्या वे ऑपरेशन भी करते थे?”

मैंने उत्तर दिया “हाँ, उन ग्रंथो सैकड़ों शल्य क्रियाओं और उपकरणों का वर्णन है।”

“तो यह एक पूरा विज्ञान तंत्र था?”

मैंने कहा “और यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता थी।”

गार्गी “पापा आपने ज्यामिति, तारे और वैद्यों की बातें बताईं, लेकिन क्या प्राचीन भारत में संख्याओं और रसायन का भी ऐसा ही ज्ञान था?”

मैंने हल्की मुस्कान के साथ उसकी ओर देखा और बोले, “ अब तुम धीरे-धीरे उस विशाल वृक्ष की जड़ों तक पहुँच रही हो, जिसे हम ‘भारतीय विज्ञान परंपरा’ कहते हैं। आज मैं तुम्हें उसी वृक्ष की और शाखाएँ दिखाता हूँ जिनमे दशमलव और रसायन भी है ।”

मैं थोड़ी देर मौन रहा, मानो स्मृतियों के किसी प्राचीन आश्रम में लौट गए चला गया हूँ , और फिर कथा आगे बढ़ाई , "कल्पना करो, वही गंगा के तट का आश्रम जहाँ शिष्य केवल वेदी ही नहीं बना रहे, बल्कि गणना भी कर रहे हैं। उन्हें क्षेत्रफल निकालना है, ईंटों की संख्या तय करनी है, और सब कुछ सटीक होना चाहिए।”

अनुषा ने पूछा, “तो वे इतनी बड़ी संख्याएँ कैसे गिनते थे?”

मैंने कहा, “यहीं पर आता है दशमलव का चमत्कार। हमारे यहाँ स्थान-मूल्य पद्धति विकसित हुई जहाँ एक ही अंक का मूल्य उसकी स्थिति के अनुसार बदलता है। और इस प्रणाली को पूर्ण रूप देने में आर्यभट्ट और विशेष रूप से ब्रह्मगुप्त का बड़ा योगदान रहा।”

गार्गी ने आश्चर्य से कहा, “क्या वही शून्य भी ?”

मैंने सिर हिलाया, “हाँ, शून्य भी, जिसे ब्रह्मगुप्त ने एक संख्या के रूप में परिभाषित किया और उसके साथ गणना के नियम भी दिए। सोचो, यदि शून्य और दशमलव न होते, तो न बड़ी गणनाएँ संभव होतीं, न खगोल की जटिल गणनाएँ। लेकिन ध्यान रखो कि माया जैसी सभ्यता ने भी स्वतन्त्र रूप से शून्य जैसी संख्या का प्रयोग किया था। ”

अनुषा कुछ सोचते हुए बोली, “तो जब वे ग्रहों की दूरी या समय निकालते थे, तब भी दशमलव काम आता था?”

“बिल्कुल,” मैंने कहा , “आकाश की सूक्ष्म गणनाएँ बिना दशमलव के संभव ही नहीं थीं। भास्कराचार्य ने तो गणना को इतनी सूक्ष्मता तक पहुँचाया कि समय और गति के अत्यंत छोटे अंतर भी समझे जा सके।”

"आज वैश्विक स्तर पर जिस संख्या प्रणाली का प्रयोग करते है, वह भारत में जन्मी और विकसित हुई है। अरब व्यापारी इसे भारत से ले गए और वे इसे हिंदसा कहते थे, उन्होंने इसे पश्चिम में पहुंचाया। "

अब गार्गी की जिज्ञासा एक नए विषय की ओर मुड़ गई “और रसायन? क्या वह भी इतना विकसित था?”

मेरी आँखों में चमक आ गई। “हाँ , रसायन,जिसे प्राचीन भारत में ‘रसशास्त्र’ कहते हैं, वह केवल धातुओं को बदलने का प्रयास नहीं था, बल्कि जीवन को समझने का विज्ञान था। उस समय बहुत से रस शास्त्रीयों ने लोहे से सोना बनाने के प्रयास भी किये।”

गार्गी, "जैसे न्यूटन के समय में कीमियागरों ने प्रयास किये ?"

मैंने आगे कहा, “हाँ लेकिन प्राचीन आचार्य धातुओं, खनिजों और औषधियों के गुणों का भी अध्ययन करते थे। वे यह समझते थे कि किस पदार्थ को कैसे मिलाया जाए, किस ताप पर उसे बदला जाए, और उसका शरीर पर क्या प्रभाव होगा।”

अनुषा ने उत्सुकता से पूछा, “क्या वैद्य भी रसायन जानते थे?”

मैंने उत्तर दिया, “निश्चित ही। चरक ने औषधियों के निर्माण में विभिन्न पदार्थों के संयोजन का ज्ञान दिया, और सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा में धातुओं और औजारों के उपयोग को विकसित किया। यह सब रसायन के बिना संभव नहीं था।”

गार्गी ने आश्चर्य से कहा, “तो क्या वे प्रयोग भी करते थे?”

मैंने उत्तर दिया , “हाँ, वे प्रयोग करते थे , अग्नि में पदार्थों को तपाना, उन्हें शुद्ध करना, और नए संयोजन बनाना। यही तो विज्ञान का मूल है ,प्रयोग और निरीक्षण।”

कुछ क्षणों के लिए दोनों मौन हो गए। फिर अनुषा ने धीरे से पूछा, “क्या यह सब अलग-अलग ज्ञान था या एक साथ जुड़ा हुआ?”

मैंने गहरी साँस लेकर कहा, “यही तो सबसे अद्भुत बात है। यह सब एक ही सूत्र में बंधा था। ज्यामिति से वेदी बनी, दशमलव से गणना हुई, खगोल से समय जाना गया, रसायन से औषधियाँ बनीं, और चिकित्सा से जीवन सुरक्षित हुआ।”

बच्चों ने आकाश की ओर देखा, जहाँ तारे धीरे-धीरे प्रकट हो रहे थे। “तो यह सब मिलकर ही ज्ञान बनता है?”

मैं मुस्कुराया , “हाँ, और यही भारतीय परंपरा का सार है,समन्वय। याद रखो कि जब तुम कोई संख्या लिखती हो, जब तुम किसी पदार्थ को बदलते हुए देखती हो, या जब तुम आकाश में तारे देखती हो, तब तुम उसी प्राचीन ज्ञान-परंपरा से जुड़ी होती हो, जिसने शून्य से अनंत तक की यात्रा को समझा।”

गार्गी और अनुषा की आँखों में अब केवल जिज्ञासा नहीं, बल्कि एक गहरी समझ थी। अनुषा ने धीरे से कहा, “अब मुझे लगता है कि विज्ञान केवल पढ़ने की चीज़ नहीं, यह तो जीवन को समझने का माध्यम है।”

मैंने संतोष से उनकी ओर देखा। आकाश में तारे चमक रहे थे, पर उस क्षण उससे भी अधिक उज्ज्वल एक नई चेतना थी,जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में प्रवाहित हो रही थी, ठीक उसी तरह जैसे ज्ञान सदियों से प्रवाहित होता आया है।

रात गहरी हो चुकी थी। आकाश तारों से भरा था। मैंने आगे कहा, “याद रखो कि ज्ञान केवल पुस्तकों में नहीं होता, वह परंपरा में, प्रयोग में और जीवन में होता है।”

गार्गी ने धीरे से कहा, “अब जब मैं तारे देखूँगी, तो मुझे केवल रोशनी नहीं, बल्कि आर्यभट्ट, वराहमिहिर, चरक और सुश्रुत की ज्ञान-ज्योति भी दिखाई देगी।”

मैं मुस्कुराया , “और वही सच्चा ज्ञान है जो हमें देखने का नया दृष्टिकोण दे। भारतीय परंपरा में जिज्ञासा, अज्ञात को जानने का प्रयास वैदिक काल से जुड़ा हुआ है।”

ऋग्वेद के नासदीय सूक्त में मानव की सबसे बड़ी जिज्ञासा सामने रखी गई है:

नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्।
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नंभः किमासीद्गहनं गभीराम्॥

अर्थात सृष्टी से पहले न असत् था, न सत् था, न अंतरिक्ष था, न आकाश, उस समय क्या था? कहाँ था? किसके शरण में था? क्या वह गहरा जल था?
- ऋग्वेद के 10वें मंडल का 129वाँ सूक्त

उस रात, केवल आकाश ही नहीं चमक रहा था ,एक नई समझ, एक नई जिज्ञासा, और हजारों वर्षों की ज्ञान-परंपरा भी उन बच्चो के भीतर प्रज्वलित हो चुकी थी।

क्रमशः (अगले भाग में यूनान)

#विज्ञान_यात्रा #शून्य_से_अनंत_की_ओर

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