बनारस के मणिकर्णिका घाट पर एक डोम राजा था जिसका नाम था कालू। वह मुर्दे जलाता था, पर वह हँसता बहुत था। लोग कहते थे, श्मशान में हँसने वाला या तो पागल है या सिद्ध।
हँसने वाला डोम
कालू तीसरी पीढ़ी का डोम था। उसके दादा ने कहा था, बेटा, हम आग देते हैं, पर हमें रोना नहीं चाहिए, क्योंकि हम दरवाजा खोलते हैं, बंद नहीं करते।
कालू हर चिता पर लकड़ी रखते समय एक भजन गुनगुनाता, कभी चाय पीते हुए मुर्दे के रिश्तेदार से पूछ लेता, बाबूजी पान खाएँगे। लोग पहले नाराज होते, फिर आदत पड़ गई।
एक दिन एक युवा संन्यासी आया, काशी में ज्ञान खोजने। नाम था नचिकेता। उसने कालू को हँसते देखा तो भड़क गया। बोला, यहाँ लोग अपने पिता खोते हैं और तुम हँसते हो, तुम्हें शर्म नहीं आती।
कालू बोला, महाराज, आप नए लगते हो। बैठो, चाय पियो।
नचिकेता बोला, मैं श्मशान में चाय नहीं पीता।
कालू हँसा, तभी तो तुम्हें दुख दिखता है।
पहली रात
नचिकेता वहीं रुक गया। उसने प्रण लिया, मैं इस डोम को वैराग्य सिखाऊँगा।
रात को एक अर्थी आई। एक 16 साल की लड़की, दुल्हन के जोड़े में। जहर खा लिया था। माँ दहाड़ मार कर रो रही थी। पिता पत्थर बना बैठा था।
नचिकेता का दिल पिघल गया। वह रोने लगा। कालू चुपचाप चिता सजा रहा था। उसने लड़की के हाथ से चूड़ियाँ उतारीं, माँ को दीं, बोला, माई, ये ले जाओ, आग में कांच पिघलता है, तुम्हारी याद पिघलेगी नहीं।
माँ और जोर से रोई। कालू ने चिता जलाई। जब आग तेज हुई, कालू ने नचिकेता से कहा, देखो।
नचिकेता ने देखा, आग में लड़की का चेहरा शांत हो गया था।
कालू बोला, रोने से वह हल्की नहीं हुई, आग से हुई। हम रोते हैं क्योंकि हम पकड़ते हैं। आग छोड़ती है।
नचिकेता चुप रहा।
दूसरी रात
अगली रात एक बूढ़ा आया, 90 साल का। उसके चार बेटे थे, सब बड़े अफसर। कोई नहीं आया। पड़ोसियों ने लाश लाई।
कालू ने चिता सजाई, अकेले ही मुखाग्नि दी। नचिकेता ने पूछा, उसके बेटे।
कालू बोला, वे कल आएँगे, अस्थि लेने। आज उन्हें मीटिंग है।
नचिकेता गुस्से में बोला, यह कैसा कलियुग।
कालू हँसा, महाराज, कलियुग यहाँ नहीं, उनके घर में है। श्मशान में सब सतयुग है। यहाँ कोई झूठ नहीं बोलता, कोई पद नहीं दिखाता। राजा हो या रंक, लकड़ी बराबर लगती है।
फिर उसने बूढ़े की चिता की राख से एक मुट्ठी उठाई, हवा में उड़ाई। बोला, देखो, यह जा रहा है। न बेटा रोक पाया, न पैसा।
नचिकेता को पहली बार हँसी आई, फीकी सी।
तीसरी रात
तीसरी रात कोई मुर्दा नहीं आया। घाट खाली था। कालू और नचिकेता बैठे थे। गंगा बह रही थी।
नचिकेता ने पूछा, तुम कभी डरते नहीं।
कालू बोला, डरता था। जब मेरा पहला बेटा हुआ, मैं डर गया कि अगर मैं मर गया तो इसे कौन जलाएगा। फिर समझ आया, जलाने वाला मैं नहीं, आग है। मैं तो केवल लकड़ी लगाता हूँ।
जैसे जीवन में हम सोचते हैं हम चलाते हैं, पर चलाने वाला कोई और है। हम सिर्फ लकड़ी लगाते हैं, अहंकार, मोह, क्रोध की। आग तो वही लगाता है।
नचिकेता बोला, तुम तो ज्ञानी निकले।
कालू बोला, ज्ञानी नहीं, घाट देख-देख कर थक गया हूँ। यहाँ रोज लोग आते हैं, कहते हैं हाय चला गया। मैं सोचता हूँ, गया नहीं, लौटा है। घर से स्कूल जाता बच्चा भी तो माँ से दूर होता है, पर लौटता है
छह महीने बाद नचिकेता काशी से जाने लगा। जाने से पहले घाट आया। देखा कालू नहीं है। पूछा तो पता चला, कालू को टीबी हो गई थी, कल रात वही चिता पर लेट गया जहाँ वह जलाता था।
उसके बेटे ने ही मुखाग्नि दी। नचिकेता दौड़ा। चिता जल रही थी। बेटा रो रहा था।
नचिकेता ने बेटे से कहा, तुम्हारे पिता हँसते थे, तुम रो क्यों रहे हो।
बेटे ने कहा, वह हँसता था क्योंकि वह जानता था, मैं रोऊँगा।
नचिकेता ने चिता के पास बैठकर वही भजन गुनगुनाया जो कालू गाता था।
उस रात घाट पर पहली बार नचिकेता हँसा। लोग चौंके। उसने कहा, मैं हँस नहीं रहा, मैं समझ गया।
आज भी
मणिकर्णिका पर अब कालू का बेटा जलाता है। वह भी हँसता है। यात्री पूछते हैं, पागल है क्या। वह कहता है, नहीं, पिताजी ने कहा था, श्मशान में रोने वाले बहुत हैं, हँसने वाला एक चाहिए, ताकि जाने वाले को लगे कोई दरवाजा खोल रहा है, बंद नहीं कर रहा।
नचिकेता अब हिमालय में है। वह अपने शिष्यों को कहता है, वैराग्य जंगल में नहीं मिलता, श्मशान में मिलता है। और श्मशान में भी तब, जब जलाने वाला हँसना सिखा दे।
क्योंकि मौत अंत नहीं, वह केवल लकड़ी बदलना है। और जो यह जान ले, वह जीते जी भी हल्का हो जाता है.....l
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