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यह कथा सिद्ध करती है कि भक्ति में जब 'अहं' मिट जाता है और पूर्ण 'शरणागति' !

संत मलूकदास जी का हृदय प्रभु की भक्ति से सदा सराबोर रहता था। एक बार उनके मन में जगन्नाथ पुरी जाकर भगवान नीलमाधव (जगन्नाथ जी) के दर्शन करने की तीव्र इच्छा जागी। उस समय यातायात के साधन नहीं थे, भक्त पैदल ही लंबी यात्राएं तय करते थे। मलूकदास जी भी अपनी लाठी लेकर 'जय जगन्नाथ' जपते हुए पैदल ही चल पड़े।

कई दिनों तक निरंतर चलने के कारण मलूकदास जी का शरीर थककर चूर हो गया। उनके पैरों में गहरे छाले पड़ गए थे और भूख-प्यास से गला सूख रहा था। चलते-चलते एक समय ऐसा आया जब उनके पैर आगे बढ़ने से इनकार करने लगे। वे एक घने वृक्ष की छाया में बैठ गए।
वहां उनके मन में एक विचित्र भाव जागा। उन्होंने सोचा— "प्रभु तो घट-घट वासी हैं। यदि मेरी भक्ति सच्ची है और मैं वास्तव में उनका दास हूँ, तो मुझे उनके पास जाने की क्या आवश्यकता? क्या वे मेरे कष्ट को नहीं देख रहे? यदि वे सच में जगन्नाथ (जगत के स्वामी) हैं, तो उन्हें स्वयं अपने भक्त की सुध लेनी चाहिए।"

मलूकदास जी ने वहीं आसन जमा लिया और एक कठिन प्रतिज्ञा की:

"हे प्रभु! अब मैं यहाँ से एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाऊंगा। यदि आप वास्तव में साक्षात हैं और मुझसे प्रेम करते हैं, तो आपको स्वयं यहाँ आकर मुझे दर्शन देने होंगे और मेरी क्षुधा (भूख) शांत करनी होगी। मैं हाथ फैलाकर कुछ नहीं मांगूंगा, आप स्वयं देंगे तो ही ग्रहण करूँगा।"

वे आंखें मूंदकर ध्यान में लीन हो गए। दोपहर बीती, शाम ढली, लेकिन मलूकदास जी अपनी जगह से टस से मस नहीं हुए।

आधी रात के समय, जब चारों ओर सन्नाटा था, अचानक उस निर्जन वन में एक दिव्य प्रकाश फैला। मलूकदास जी ने अनुभव किया कि कोई उनके पास खड़ा है। उन्होंने आंखें खोलीं तो देखा कि एक सांवला सा, सुंदर बालक हाथ में सोने का थाल लिए खड़ा है। उस थाल में गरमा-गरम भात (चावल), दाल और सुगंधित प्रसाद था।
बालक ने बड़े प्रेम से कहा— "बाबा, आप बहुत थके और भूखे हैं। जगन्नाथ जी ने आपके लिए यह महाप्रसाद भेजा है। उठिए और इसे पा लीजिए।"
मलूकदास जी ने मुस्कुराकर पूछा— "बेटा, तू कौन है? और इतनी रात को जंगल में अकेले क्यों आया?"
बालक बोला— "मैं मंदिर का सेवक हूँ, प्रभु की आज्ञा टाल नहीं सकता। उन्होंने कहा कि मेरा मलूक भूखा बैठा है, उसे यह प्रसाद दे आओ।"
मलूकदास जी ने तृप्त होकर भोजन किया। बालक ने कहा— "बाबा, अब आप विश्राम करें, मैं यह थाल लेकर जाता हूँ।" लेकिन मलूकदास जी की झपकी लग गई और जब उनकी आँख खुली, तो न वह बालक था और न ही वह स्वर्ण थाल।

अगले दिन सुबह जब पुरी के मंदिर के कपाट खुले, तो पुजारी और पहरेदार सन्न रह गए। भगवान के भोग लगाने वाला 'स्वर्ण थाल' गायब था। पूरे नगर में शोर मच गया कि किसी ने मंदिर में चोरी की है। राजा ने सख्त आदेश दिए कि चोर को तुरंत पकड़ा जाए।
तभी मंदिर के मुख्य पुजारी को स्वप्न आया और मंदिर के भीतर से एक गूँज सुनाई दी— "मेरा भक्त मलूकदास जंगल में थका हुआ बैठा था। वह स्वर्ण थाल चोरी नहीं हुआ है, बल्कि मैं स्वयं उसे लेकर अपने भक्त को भोजन कराने गया था। वह थाल उसी वृक्ष के नीचे है जहाँ मेरा मलूक विश्राम कर रहा है।"

राजा, सैनिक और पुजारी उस स्थान की ओर दौड़े। वहां उन्होंने देखा कि एक दिव्य कांति वाले संत (मलूकदास जी) ध्यान में लीन हैं और उनके बगल में मंदिर का वह बहुमूल्य स्वर्ण थाल पड़ा है।
जब मलूकदास जी की समाधि टूटी, तो उन्होंने देखा कि हजारों लोग उनके चरणों में झुके हुए हैं। राजा ने उनसे क्षमा मांगी। मलूकदास जी की आँखों से अश्रु बहने लगे। उन्हें समझ आ गया कि कल रात वह बालक कोई और नहीं, स्वयं साक्षात जगन्नाथ जी थे।

यह कथा सिद्ध करती है कि भक्ति में जब 'अहं' मिट जाता है और पूर्ण 'शरणागति' आ जाती है, तो भक्त को भगवान के पास जाने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि ईश्वर स्वयं भक्त की खोज में निकल पड़ते हैं।
इसी भाव को मलूकदास जी ने अपने अमर दोहे में पिरोया है:

 "अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।
दास मलूका कह गए, सबके दाता राम॥"

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