एक सुबह, सम्राट अकबर झरोखे से नीचे देख रहे थे। उनकी नज़र एक फटे-हाल ब्राह्मण पर पड़ी जो राहगीरों के सामने हाथ फैलाकर भिक्षा मांग रहा था। अकबर ने व्यंग्य से बीरबल की ओर देखा और कहा— "बीरबल! देखो अपने इन देवताओं को! तुम तो कहते हो कि ब्राह्मण 'ब्रह्म' का रूप है, लेकिन ये तो दो कौड़ी के सिक्कों के लिए इंसानों के आगे हाथ फैला रहा है।"
बीरबल ने मौन साध लिया। उन्होंने जान लिया था कि आज सम्राट को केवल तर्क से नहीं, बल्कि ईश्वर के साक्षात् चमत्कार से उत्तर देना होगा।
भिखारी से साधक की यात्रा
बीरबल उस ब्राह्मण के पास गए और बोले— "पंडित जी, कल से आप भिक्षा मांगना छोड़ दें। आप केवल गायत्री मंत्र का जाप करें। इसके बदले मैं आपको प्रतिदिन 10 अशर्फियाँ दूँगा।"
ब्राह्मण के लिए यह एक सौदा था। उसने सोचा— "मज़े की बात है! भगवान का नाम भी लो और पेट भी भरो।" वह अगले दिन से एक पुराने वटवृक्ष के नीचे बैठकर जाप करने लगा। शाम होती, तो बीरबल उसे अशर्फियाँ थमा देते।
शुरुआत में, ब्राह्मण का मन केवल सिक्कों की खनक में रहता था। वह बार-बार आंख खोलकर देखता कि सूरज कब डूबेगा और कब बीरबल आएंगे। लेकिन ईश्वर का नाम एक ऐसी अग्नि है, जो धीरे-धीरे भीतर के कचरे को जला देती है।
कुछ महीने बीते। अब ब्राह्मण की आँखें बंद रहने लगी थीं। मंत्र की गूंज उसके रोम-रोम में बैठने लगी। एक दिन बीरबल अशर्फियाँ लेकर पहुँचे, तो ब्राह्मण ने आँखें ही नहीं खोलीं। बीरबल ने सिक्कों की थैली पास रख दी, लेकिन ब्राह्मण को उसका भान ही नहीं हुआ।
ईश्वर की सत्ता ने उस पर अपना रंग चढ़ाना शुरू कर दिया था। अब उसे न भूख सताती, न प्यास। उसके मन में विचार आया— "मूर्ख हूँ मैं! जो ईश्वर पूरी सृष्टि का पालन करता है, क्या वह मेरा पेट नहीं भर सकता? मैं बीरबल के चंद टुकड़ों के लिए उस परमात्मा का नाम क्यों बेच रहा हूँ?"
अगले दिन उसने बीरबल से कह दिया— "मंत्री जी, अब इन सिक्कों को ले जाइए। मेरा हिसाब उस 'परम-पिता' से हो गया है। जिसने मुझे जीवन दिया है, अब वही मेरा रक्षक है।"
उस ब्राह्मण के चेहरे पर अब अलौकिक तेज था। उसकी तपस्या की सुगंध पूरे राज्य में फैल गई। लोग उसे संत मानकर दूर-दूर से दर्शन करने आने लगे। अंततः अकबर भी बीरबल के साथ उस "महान संत" के दर्शन करने पहुँचे।
सम्राट ने सोने के थाल और रेशमी वस्त्र भेंट किए, लेकिन उस संत ने उनकी ओर देखा तक नहीं। अकबर ने श्रद्धापूर्वक उनके चरणों में अपना सिर नवा दिया।
बाहर आकर अकबर बोले— "बीरबल! आज तक मैंने ऐसा तेजस्वी पुरुष नहीं देखा। इनके चरणों में झुकते ही मन शांत हो गया। ये कौन हैं?"
बीरबल ने मुस्कुराते हुए कहा— "जहाँपनाह! यह वही 'दो कौड़ी का भिखारी' है जिसे आपने उस दिन झरोखे से देखा था।"
अकबर दंग रह गए। बीरबल ने आगे कहा:
"महाराज, जब तक यह ब्राह्मण इंसानों से मांग रहा था, तब तक यह भिखारी था। लेकिन जिस दिन इसने ईश्वर का दामन थामा और खुद को उस 'परम शक्ति' को सौंप दिया, उस दिन यह स्वयं ब्रह्म का रूप हो गया। आज आपने एक मनुष्य को नहीं, बल्कि उसके भीतर प्रकटे ईश्वर को प्रणाम किया है।"
अकबर का अहंकार चूर-चूर हो गया। उन्हें समझ आ गया कि जो ईश्वर की शरण में होता है, दुनिया उसके चरणों में होती है।
कथा की सीख
जब हम भगवान को केवल 'साधन' मानते हैं, तो हमें दुनिया की चीजें मिलती हैं। लेकिन जब हम भगवान को ही 'साध्य' मान लेते हैं, तो पूरी दुनिया हमारे पीछे चलने लगती है।
संसार के आगे हाथ फैलाने वाला 'याचक' बनता है और ईश्वर के आगे झुकने वाला 'नायक' बन जाता है।
"ईश्वर की सत्ता वहां से शुरू होती है, जहां इंसान का भरोसा खुद पर से खत्म होकर उस पर टिक जाता है।"
जय श्री राम!
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